Mauni Amavasya 2021: गंगा तटों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, जानें ‘मौनी अमावस्या’ व्रत की कथा

माघ मास की अमावस्या को ‘मौनी अमावस्या’ कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है इसलिए इस दिन गंगा में स्नान करने का खास महत्व होता है

लखनऊ: माघ मास की अमावस्या को ‘मौनी अमावस्या’ (Mauni Amavasya) कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है इसलिए इस दिन गंगा में स्नान करने का खास महत्व होता है। गंगा तट पर इसी कारण भक्त जन एक महीने तक कुटीया बनाकर गंगा में स्नान और ध्यान करते हैं।

संगम तट पर स्नान

‘मौनी अमावस्या’ के अवसर पर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में श्रद्धालु सुबह से ही गंगा में स्नान करने के लिए पहुंच रहे हैं। इसके साथ ही वाराणसी के गंगा घाटों पर भक्तों का तांता लगा हुआ है। देव भूमि हरिद्वार में भी भोर से ही मौनी अमावस्या पर श्रद्धालु स्नान करने के लिए हरकी पैड़ी और दूसरे घाटों पर पहुंचते रहे हैं। ऐसी मान्यता है की माघ महीने में गंगा में स्नान करने से मनुष्यों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु स्नान करने के बाद दान-पुण्य भी करते हैं।

संगम में स्नान करने की कथा

जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए उस समय देवताओं एवं असुरों में ‘अमृत कलश’ के लिए खींचा-तानी शुरू हो गयी इससे अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में जा गिरी। यही कारण है कि यहां की नदियों में स्नान करने पर ‘अमृत स्नान’ का पुण्य प्राप्त होता है। यह तिथि अगर सोमवार के दिन पड़ती है तब इसका महत्व कई गुणा बढ़ जाता है।

अगर सोमवार हो और साथ ही महाकुम्भ लगा हो तब इसका महत्व अनन्त गुणा हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है सत युग में जो पुण्य तप से मिलता है द्वापर में हरि भक्ति से, त्रेता में ज्ञान से, कलियुग में दान से, लेकिन माघ मास में संगम स्नान हर युग में अन्नंत पुण्यदायी होगा। इस तिथि को पवित्र नदियों में स्नान के पश्चात अपने सामर्थ के अनुसार अन्न, वस्त्र, धन, गौ, भूमि, तथा स्वर्ण जो भी आपकी इच्छा हो दान देना चाहिए। इस दिन तिल दान भी उत्तम कहा गया है। इस तिथि को मौनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है अर्थात मौन अमवस्या।

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मौनी अमावस्या क्यों कहा जाता है?

मौनी अमावस्या में व्रत करने वाले को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता इसलिए यह योग पर आधारित व्रत कहलाता है। शास्त्रों में लिखित है कि होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन का मनका फेरकर हरि का नाम लेने से मिलता है। इसी तिथि को संतों की भांति चुप रहें तो उत्तम है। अगर संभव नहीं हो तो अपने मुख से कोई भी कटु शब्द न निकालें। इस तिथि को भगवान विष्णु और शिव जी दोनों की पूजा  करने का विधान है।

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