मोदी सरकार का संसद में बेतुका बयान, प्रवासी मजदूरों की मौत का आकड़ा नहीं तो मुआवजे का सवाल ही नहीं

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इस देश में आम आदमी के जान की क्या कीमत है, इसका अंदाजा आप सरकार के इस बेतुका बयान से ही लगा सकते है। लॉक डाउन के दौरान लाखों परिवार को अपनी रोजी रोटी छोड़कर गांव पलायन करना पड़ा था, इस दौरान हजारों लोगों ने अपनी जान गवां दी थी। लेकिन गरीबों की सेवक कहने वाली मोदी सरकार पहले तो बिना रणनीति के लॉक डाउन लगा कर लाखो लोगों की जिंदगी संकट में डाल दी थी। तो वहीँ अब मुआवजे को लेकर सवाल पूछने पर बोल रही, कितने लोग मरे इसका हमारे पास कोई अकड़ा नहीं तो मुआवजा देने का सवाल ही नहीं उठता।

प्रवासी मजदूर : NHRC ने यूपी, बिहार, गुजरात के साथ रेलवे बोर्ड से भी मांगा  जवाब - migrant laborers nhrc seeks response from up bihar gujarat as well  as railway board rkdsnt

दरअसल विपक्ष लगातार लॉक डाउन के दौरान मरने वाले प्रवासी मजदूरों के मुआवजे की मांग कर रहा था। विपक्ष ने सरकार से पूछा की लॉक डाउन में मरने वाले प्रवासी मजदूरों को मुआवजे में क्या दिया गया, विपक्ष के इस सवाल पर केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने लिखित जवाब देकर बताया कि सरकार के पास ऐसा कोई अकड़ा उपलब्ध नहीं है कि कितने लोगों की लॉक डाउन के दौरान मृत्यु हुई। सरकार ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान करीब एक करोड़ लोगों को उनके गृह राज्य पहुंचाया गया है।

सरकार के इस बेतुके जवाब पर विपक्ष भड़क उठा,कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा की यह चिंताजनक है कि सरकार के पास प्रवासी मजदूरों के मौत का कोई आकड़ा नहीं है, लगता है सरकार अंधी हो गई है,या तो जनता के सब्र का फायदा उठा रही है। बता दें कि कोरोना वायरस की वजह से भारत में मार्च के महीने में ही लॉक डाउन लगा दिया गया था, जिस दौरान काम काज बंद होने की वजह से लाखो मजदूर पैदल ही घर की तरफ निकल दिए थे। सरकार की तरफ से पर्याप्त सहयोग ना मिलने से कइयों की रास्ते में मौत हो गई थी, कई घर पहुंचते मर गए थे। आख़िरकार मजबूर होकर सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रैन चलाई थी, लेकिन उसमें भी किराया वसूला जा रहा था। जिसकी वजह से हार मान कर लाखों मजदूर पैदल ही अपने गृह राज्य गए थे। इस दौरान हुए हादसों में हजारों लोगों की जान चली गई थी।

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