फिल्म रिव्यू: भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण की कहानी को बड़े ही रोचक अंदाज में दर्शाती है फिल्म ‘परमाणु’

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फिल्म का नाम: राज़ी

स्टार कास्ट: जॉन अब्राहम, डायना पेंटी, बोमन ईरानी आदि।

निर्देशक: अभिषेक शर्मा

निर्माता: जॉन अब्राहम

रेटिंग : 3।5 स्‍टार

अविधि : 2 घंटे 18 मिनट

ये है फिल्म की कहानी-
‘परमाणु’ की कहानी 1995 से शुरू होती है, जब प्रधानमंत्री के ऑफिस में चीन के परमाणु परीक्षण के बारे में बातचीत चल रही है। इसी दौरान IAS ऑफिसर अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) भारत को भी एक न्यूक्लियर पावर बनने की सलाह देते हैं। उनकी बात पीएम तक पहुंचाई जाती है, लेकिन परीक्षण सफल नहीं हो पाता है। इस मामले में अमेरिका हस्तक्षेप करता है और अश्वत को बर्खास्त कर दिया जाता है।

करीब 3 साल बाद प्रधानमंत्री के सचिव के रूप में हिमांशु शुक्ला (बमन ईरानी) की एंट्री होती है और एक बार फिर परमाणु परीक्षण की बात छिड़ जाती है। फिर अश्वत को खोजा जाता है और टीम बनाने के लिए कहा जाता है। कुछ गिनी-चुनी फ़िल्में जैसे ’26/1′ या ‘ब्लैक फ्राइडे’ हैं जो सच्ची घटनाओं पर सिलसिलेवार नज़र डालती हैं, उसी कड़ी को आगे बढ़ाती हुई फ़िल्म है- ‘परमाणु: द स्टोरी ऑफ़ पोखरण’!. भारत के परमाणु विस्फोट को लेकर एक के बाद एक घटनाक्रम को रिपोर्टिंग के अंदाज़ में बयां  …

डायरेक्शन-
फिल्म का स्क्रीनप्ले जबरदस्त है, जिसके लिए इसके लेखक सेवन क्वाद्रस, संयुक्ता चावला शेख और अभिषेक शर्मा बधाई के पात्र हैं। फिल्म आपको बांधने में सफल रहती है और भारतीय होने के नाते एक अलग तरह का फक्र भी आपको महसूस होता है।

फिल्म का डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी और लोकेशन बढ़िया है. इसी के साथ समय समय पर प्रयोग में लाई जाने वाली 90 के दशक की फुटेज भी काफी कारगर है, जिन्हें बड़े ही अच्छे अंदाज से फिल्म के स्क्रीनप्ले में प्रयोग में लाया गया है.

एक्टिंग-
अभिनय के मामले में सभी अपने अपने किरदार में घुसे हुए नजर आते हैं। सबसे पहले बात जॉन की ही करते हैं। जॉन को जितनी मेहनत इस फिल्म के लिए करनी थी वो सभी कुछ उन्होंने इसमें झोंक दिया है लेकिन अभी भी उनके चेहरे के एक्सप्रेशन को देखकर परेशानी होती है। बेहद ही इंटेंस सीन्स और इमोशनल मोमेंट्स के दौरान वो मात खा जाते हैं।

कमजोर कड़ियां-
फिल्म में 1998 के परमाणु परीक्षण के इतिहास को दर्शाने की कोशिश की गई है। कई ऐसी बातें हैं जिन्हें शायद सुरक्षा की दृष्टि से डिटेल में नहीं समझाया गया है और अगर छिटपुट बातों को छोड़ दें तो कोई ऐसी कमजोर कड़ी नहीं है।

देखें या नहीं-
परमाणु अगर एक अच्छी फिल्म बन सकी है तो उसका सेहरा फिल्म के लेखक संयुक्ता चावला और साइवन क्वाड्रोस के सिर पर बंधना चाहिए। देखकर खुशी होती है कि इन लोगों ने एक अच्छी कहानी को सामने लाने के लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं किया है। यह फिल्म कई मामलो में आपको शिमित अमीन की फिल्म चक दे इंडिया की याद दिलाएगी।

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