फिजिकली और मेंटली डिसेबल बच्चों के लिए मल्टीप्लेक्स ने शुरू की एक अनोखी पहल

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दुनिया में ऐसे बहुत से बच्चे, बूढ़े जवान हैं जो फिजिकल और मेंटल डिसएबिलिटी से जूझ रहे हैं। फिट न होने के कारण उन्हें हर कदम पर कई कठिन परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ रहा है। ऐसे लोगों के साथ ज्यादातर लोग अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं जिसके चलते इन्हें सर्वाइव करने में दिक्कत हो रही है।

फिजिकली और मेंटली डिसेबल बच्चों के लिए मल्टीप्लेक्स ने शुरू की एक अनोखी पहल

सिनेमा हॉल में भी उनके लिए कोई खास इंतजाम नहीं होते। यही वजह है कि अक्षमताओं से जूझ रहे बच्चे कभी सिनेमाहॉल के भीतर नहीं जा पाते। अगर हम बात करें कैरियर की ऐसे लोग अपने सपने पूरे करने में असक्षम होने के कारण आसमान की बुलंदियों को नहीं छू पाते हैं, लेकिन आज के दौर में बहुत से ऐसे लोग हैं डिसेबल होने के बावजूद अपना परचम लहरा रहे हैं, चाहे वो खेल जगत हो या अन्य। ऐसी कई स्टोरीज़ सामने आ रहीं हैं जो हमे काफी हद तक इंस्पायर करती हैं।

ऐसी ही कहानियों में एक और कहानी शामिल है, जो समाज का आइना है। चेन्नई के एसपीआई सिनेमा ने हाल ही में एक पहल की शुरुआत की है जिसके तहत हर रविवार ऐसे बच्चों को फिल्में दिखाई जाती हैं।

ये है कहानी…

बीते रविवार को आठ साल की वंदना काफी उत्साह में अपने पिता के साथ फिल्म देखने आई थी। वंदना की ही तरह कई सारे बच्चे अपने माता-पिता के साथ पहली बार सिनेमाहॉल के अंदर आए थे। किसी भी शहर में ऐसे सिनेमाहॉल नहीं होंगे जहां अक्षम बच्चों के लिए अलग से कोई सुविधा हो। एसपीआई सिनेमा ने ‘सेन्स’ (SPECIAL SHOW FOR SPECIAL MINDS) के नाम से एक पहल शुरू की है।

वंदना के पिता ने कहा कि वह फिल्म देखने से ज्यादा बच्चे सिनेमाहॉल के भीतर का अनुभव एंजॉय कर रहे थे। उन्होंने पहली बार अपने बच्चों को सिनेमाहॉल के अंदर कोई फिल्म दिखाई। शहरों में कहीं भी कोई सुविधा नहीं होती इसलिए वे अपने बच्चों को कभी बाहर लेकर नहीं जा पाते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे बच्चे सिर्फ घर से स्कूल के दायरे में सिमटकर रह जाते हैं। एसपीआई सिनेमा की पीआर हेड प्रीता रामास्वाममी ने कहा कि सेन्स एक ऐसी पहल है जिसके तहत सबके लिए सिनेमा को सुलभ और आसान बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘यह काफी महत्वकांक्षी प्रॉजेक्ट है। हम समाज में सिनेमा के जरिए बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। हमने इसे पायलट प्रॉजेक्ट की तरह लॉन्च किया था, लेकिन सफलता मिलने के बाद इसे मासिक तौर पर नियमित कर दिया गया है।’

शारीरिक और मानसिक अक्षमता से जूझ रहे बच्चों के परिवारों के लिए ‘ए स्पेशल वर्ल्ड’ नाम से सपोर्ट ग्रुप चलाने वाली माला चिनप्पा की सोच से यह सब संभव हो पाया। उन्होंने बताया कि इस पहल को शुरू हुए दो साल हो रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘पहले हम हॉल में पूरी एक लाइन ही बुक कर लेते थे, लेकिन जब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो इसे इस रूप में शुरू करना पड़ा।’ उन्होंने बताया कि हॉल के भीतर सामान्य की अपेक्षा आवाज थोड़ी धीमी रखी जाती है ताकि बच्चों को किसी तरह की परेशानी न हो। इसके साथ ही हॉल में मध्यम रोशनी भी होती है जिससे बच्चे आसानी से कहीं भी आ जा सकते हैं।

माला बताती हैं कि अब लोग अधिक जागरूक हो रहे हैं और उन्हें समझ आ रहा है कि बच्चों के लिए ये कितना जरूरी है। एक अनुभव साझा करते हुए वह कहती हैं, ‘हाल ही में गलती से एक परिवार पीटर रैबिट फिल्म देखने हमारे थिएटर में आ गया। हमने उन्हें बताया कि यहां ऐसे बच्चे फिल्म देख रहे हैं तो वे तुरंत समझ गए और उन्होंने पूरा सहयोग किया।’ इस पहल का काफी असर हुआ है और कई सारे परिवार अपने बच्चों को हर महीने फिल्म दिखाने ले आते हैं। बच्चों को इससे असीम खुशी मिलती है। यह पहल अभी सिर्फ चेन्नई और कोयंबटूर में ही लेकिन इसे मुंबई और बेंगलुरु में भी लॉन्च करने की योजना बनाई जा रही है।

तो आपने देखा कि कैसे समाज को शारीरिक और मानसिक तौर पर असक्षम लोगों को अपनाना चाहिए और उनके साथ अच्छे से बर्ताव करना चाहिए।

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