मुरुगादॉस की घिसी पिटी कहानी ने नहीं सजने दिया दरबार, देखिए मिले इतने स्टार

रजनीकांत भारतीय सिनेमा का मिथ हैं। पिछले दशक में रिलीज हुईं उनकी नौ फिल्मों में से तमाम हिंदी में भी डब होकर रिलीज हुईं लेकिन पेट्टा, 2.0 और कबाली में हिंदी सिनेमा के दर्शक अपने हाथ जला चुके हैं। अब बारी दरबार की है। दरबार सिनेमा के लिहाज से कुछ ज्यादा नहीं परोसती। रजनीकांत के कंधे पर एक कमजोर कहानी लादकर मुरुगादॉस ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है। ये रजनीकांत का ही कमाल है कि एक औसत से कमतर फिल्म को लेकर भी उनके फैंस दीवाने बने रहते हैं।

आदित्य अरुणाचलम (रजनीकांत) मुंबई का कमिश्नर है। वर्षों पहले एक अपराधी हरि चोपड़ा (सुनील शेट्टी) ने ऐसा काम किया था जिससे पुलिस की इज्जत घट गई थी। उसकी तलाश आदित्य को है। इसी बीच आदित्य के साथ एक हादसा भी होता है। आदित्य को समझ नहीं आता कि कौन ये सब कर रहा है? इस गुत्थी को वह कैसे सुलझाता है? क्या हरि तक वह पहुंच पाता है या नहीं? लिखने का डिपार्टमेंट भी मुरुगदास ने ही संभाला है। उनकी कहानी में कोई नई बात नजर नहीं आती। हालांकि उन्होंने टर्न और ट्विस्ट अच्छे डाले हैं जिस वजह से फिल्म में रूचि बनी रहती है। कहानी लिखते समय उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि एक्शन सीन इसमें समय-समय पर आते रहे।
साथ ही उन्होंने आदित्य और लिली (नयनतारा) की प्रेम कहानी को दर्शाया है। बदमाशों के सामने शेर की तरह दहाड़ने वाले आदित्य, लिली के सामने कैसे भीगी बिल्ली बन जाता है ये फिल्म का मनोरंजक पहलू है। इमोशन्स भी फिल्म में डाले गए हैं। कहानी में कई ऐसी बातें हैं जिन पर सवाल किए जा सकते हैं, लेकिन मुरुगदास ने इन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। रजनीकांत के नाम पर उन्होंने यह छूट ले ली और जब स्क्रीन पर रजनीकांत हो तो उनके प्रशंसक इन बातों पर गौर भी नहीं करते हैं। फिल्म फर्स्ट हाफ में तो सरपट भागती है और अच्छा मनोरंजन भी करती है, लेकिन दूसरा हाफ इतना मजेदार नहीं है। फिल्म के विलेन हरि चोपड़ा के बारे में बात तो खूब की गई है, लेकिन उसे स्क्रीन पर ज्यादा समय नहीं दिया गया है। उसके बारे में ज्यादा बताया नहीं गया है जो कहीं ना कहीं फिल्म को नुकसान पहुंचाता है। फिल्म का क्लाइमैक्स बहुत ही रोमांचक और एक्शन से भरपूर होने की उम्मीद थी जो पूरी नहीं होती।
रजनीकांत जब फाइट करते हैं, रजनीकांत जब चलते हैं, रजनीकांत जब डायलॉग बोलते हैं, उनकी हर अदा स्टाइलिश लगती है। मुरुगदास ने रजनीकांत का एंट्री सीन के लिए जोरदार माहौल बनाया है। उन्होंने फाइट दृश्यों के लिए सिचुएशन भी अच्छी बनाई है और इमोशन-कॉमेडी-एक्शन का मिश्रण अच्छे से किया है। फिल्म के गाने साधारण हैं और शोरगुल से भरे हुए हैं। यही हाल बैकग्राउंड म्युजिक का है। यह इतना ज्यादा लाउड है कि कान के परदे हिल जाते हैं। रजनीकांत फुल फॉर्म में नजर आए। इस उम्र में भी उन्होंने अच्छी फुर्ती दिखाई। उनकी स्टाइल देखने लायक है। एक्शन सीन भी उन्होंने विश्वसनीयता के साथ निभाए हैं। ‘खुद पर यकीन करने वालों के लिए उम्र तो महज नम्बर है’ और ‘मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है’ जैसी लाइनें जब रजनीकांत बोलते हैं तो लगता है कि यह किरदार नहीं खुद रजनी बोल रहे हैं।

फिल्म का निर्देशन एआर मुरुगदास ने किया है जिन्हें हिंदी भाषी दर्शक गजनी, अकीरा और हॉलिडे जैसी फिल्मों के लिए जानते हैं। मुरुगदास की खासियत है कि कमर्शियल फिल्म बनाते हुए भी वे कुछ अलग करने का प्रयास करते हैं। लेकिन दरबारमें मुरुगदास की यह खासियत दब सी गई है।

Related Articles