मप्र में नए राजनीतिक मोर्चे की कदमताल

भोपाल| मध्य प्रदेश के रतलाम-झाबुआ संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में भले ही कांग्रेस को जीत मिली हो, मगर गैर कांग्रेसी व गैर भाजपाई दलों को अपना भविष्य संवरने की किरण नजर आने लगी है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलने वाले पांच राजनीतिक दल मिलकर राज्य की सियासी चौसर पर सधी हुई चाल चलने के लिए लामबंद हो रहे हैं।

पार्टियों का है अपना-अपना गणित

वैसे तो मध्य प्रदेश की राजनीति भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच ही सिमटी है, मगर कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां इन दोनों दलों के अलावा अन्य दलों का भी प्रभाव है, इनमें जनता दल-युनाइटेड (जदयू), मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और राष्ट्रीय समानता दल शामिल हैं।  इसकी वजह है, क्योंकि राज्य में समाजवादी, कम्युनिस्ट, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कई विधायक और सांसद तक चुने गए हैं। इन दलों की पिछड़ों और दलितों में पकड़ अब भी बनी हुई है। माकपा के प्रदेश सचिव बादल सरोज का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस को लेकर जनता में नाराजगी लगातार बढ़ रही है, इसका प्रमाण पिछले लोकसभा व राज्य विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस से नाराज हुए तो भाजपा को जिता दिया और भाजपा से नाराज होने पर रतलाम के उप-चुनाव में कांग्रेस के खाते में जीत आ गई। उन्होंने कहा कि मतदाताओं को अगर राज्य में मजबूत विकल्प मिल जाए तो वे दोनों दलों को नकार देंगे।

जरूरत सबको एकजुट करके भरोसे में लेने की है

सरोज आगे कहते हैं कि राज्य में अभी विधानसभा चुनाव को तीन वर्ष है, इसीलिए पांच दल मिलकर जनता के सामने एक साझा कार्यक्रम के साथ जाएंगे और उन्हें भरोसा दिलाएंगे कि यह दल उनकी बेहतरी के लिए काम करेंगे,जो कांग्रेस और भाजपा नहीं कर सके हैं। नई संभावना के चलते ही पांच दल एक बैनर तले आ रहे हैं। इन दलों ने मिलकर पिछले दिनों जबलपुर नगर निगम के महापौर पद और रतलाम लोकसभा उपचुनाव लड़ा था, इन चुनाव में उम्मीदवार को मिले वोटों ने इन दलों को और करीब आने को मजबूर कर दिया है। जदयू के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद यादव का कहना है कि राज्य के 230 विधानसभा क्षेत्रों में 100 ऐसे हैं, जहां गठबंधन की तैयारी करने वाले पांच दलों में से किसी न किसी का प्रभाव अब भी है। ये वे इलाके हैं जहां से इन दलों से नाता रखने वाले कभी न कभी विधायक या सांसद का चुनाव जीते हैं। इसका मतलब है कि वहां इन दलों की विचारधारा को मानने वाले हैं, बस जरूरत उन्हें फिर एकजुट कर भरोसे में लेने की है।

राज्य में आगामी दिनों में मैहर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव होने वाला है। इस क्षेत्र में जदयू, माकपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की गहरी पैठ है, पिछले चुनावों में यहां जदयू के उम्मीदवार तीसरे स्थान तक पर रहे हैं। यही कारण है कि यह पांचों दल मिलकर संयुक्त उम्मीदवार मैदान में उतारने की तैयारी में जुट गए हैं। पांचों दलों के प्रतिनिधियों की शुक्रवार को भोपाल में हुई एक बैठक में तय किया गया है कि मुद्दों के आधार पर राजनीति की जाएगी, राष्ट्रीय स्तर पर दलों के बीच चाहे कितनी ही दूरी क्यों न रहे, मगर वे मध्य प्रदेश में मिलकर राजनीति करेंगे। शुरुआत में ये दल राज्य में दलित व पिछड़ों पर हो रहे अत्याचारों के मामले पर मुहिम छेड़ने वाले हैं। इसके बाद वे जमीन, जंगल व जल की लड़ाई तेज करेंगे।

राजनीति के जानकारों की मानें तो राज्य में समाजवादी, कम्युनिस्ट और आदिवासी वर्ग का बड़ा वोट बैंक है, मगर बिखरा हुआ है। नतीजतन इन दलों के उतने उम्मीदवार विधानसभा या लोकसभा तक नहीं पहुंच पाते हैं, जितने के वे हकदार हैं। इस स्थिति में ये पांच दल मिलकर जनता तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रहे तो कई चौंकाने वाले नतीजे आने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

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