भारत नेपाल के बीच हैं ये नौ दिक्‍कतें

फाइल फोटो
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काठमांडू। भारत-नेपाल की जिस दोस्‍ती के दुनिया में किस्‍से सुनाए जाते हैं, आज वो खटाई में पड़ रही है। दोनों देशों की वैचारिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक और राजनीतिक हलचलों का एक-दूसरे पर गंभीर असर पड़ता है। लेकिन इधर जब नेपाल ने अपना संविधान बनाया तो भारत की ‘ठंडी प्रतिक्रिया’ ने दोनों देशों के रिश्‍तों को भी ठंडे बस्‍ते में डाल दिया।

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1- संविधान पर तनातनी

नेपाल की छोटी सी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह से, भारत से आने वाले सामान की आपूर्ति पर टिकी है। नमक से लेकर कार और पेट्रोल से लेकर दवाओं तक सब कुछ भारत से आता है। लेकिन इधर दो महीनों से नेपाल के संविधान का विरोध कर रहे मधेसियों के कारण सीमा पर नाकेबंदी जैसे हालात हैं।

भारत खुले तौर पर दक्षिणी नेपाल की उन पार्टियों का समर्थन कर रहा है जो संविधान का विरोध कर रही हैं जबकि नेपाल की बड़ी पार्टियों ने भारत पर देश की आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया है। अब भले ही मधेशियों की मांगे मानकर नेपाल सरकार संविधान में संशोधन को राजी हो गई हो। लेकिन इसे भारत के अडि़यल रवैये का असर माना जा रहा है। वैसे, नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने और उसका समर्थन करने का श्रेय भी बहुत हद तक भारत को ही जाता है।

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2-बड़े भाई का दबदबा नापसंद

बहुत से नेपाली लोगों को लगता है कि नेपाल के मामले में भारत ‘बड़े भाई वाला दबदबा’ दिखाता है। भारत पर आरोप लगते रहे हैं कि वो कूटनीतिक ताक़त का इस्तेमाल नेपाल में अपने हितों को साधने के लिए करता है। ‘नाकेबंदी’ प्रकरण को भी बहुत से लोग इसी का एक उदाहरण मानते हैं।

3-अजग-गजब संधियां

1950 की शांति और मित्रता संधि से लेकर गंडक, कोशी और महाकाली जल संधि तक कई ऐसे ऐतिहासिक दस्‍तावेज हैं, जिन पर नेपाल के लोग सवाल उठाते रहे हैं। लोगों को लगता है न उन्‍हें दोस्‍ती का फायदा मिल रहा है, न ही हक का पानी। नेपाली लोग इस बात से भी नाराज रहते हैं कि वहां के राजनीतिक आका भारत के आगे दुम दबाए रहते हैं।

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