न चेहरा, न लहर, पहली बार मध्यप्रदेश में चुनाव है बेअसर :- लोकसभा चुनाव 2019

भोपाल: लगभग 42 साल बाद पहला चुनाव है, जिसमें न तो कोई चेहरा है न कोई लहर। 1977 के बाद पहली बार इस चुनाव मैदान में भाजपा और कांग्रेस की ओर से कोई बड़ी शख्सियत नहीं है। यानी ये चुनाव बिना किसी के आभामंडल के हो रहा है। जनता लहर के बाद 1980 और 1984 के चुनाव में प्रदेश के शीर्ष नेता रहे अर्जुन सिंह का चेहरा सर्वोपरि था। वहीं 1990 का चुनाव सुंदरलाल पटवा के नाम रहा।

1993 और 1998 के चुनाव में दिग्विजय सिंह का एकतरफा रोल रहा तो 2003 में उमा भारती आईं। इसके बाद 2008, 2013 और 2018 के चुनाव पर शिवराजसिंह चौहान की लोकप्रियता हावी रही। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में भी मोदी-शिवराज की छवि को सामने रखा गया। पर यह पहला चुनाव है, जिसमें किसी का आभामंडल हावी नहीं है। प्रदेश में कांग्रेस की ओर से भी कोई चेहरा नहीं और भाजपा की ओर से भी इस बार कोई बड़ा नाम या लहर का असर नहीं है।

1977 में जनता लहर

1977 की विधानसभा तक लगातार एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस को आपातकाल के बाद जनता लहर में भारी शिकस्त मिली थी। जनसंघ के गठन के समय से पार्टी से जुड़े दिग्गज नेता कैलाश जोशी को जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाया। उस चुनाव में जनता पार्टी को 230 सीटों पर भारी विजय मिली और कांग्रेस सिर्फ 84 सीटों पर सिमट गई।

फिर अर्जुन सिंह का दौर

भारतीय जनसंघ, जनता पार्टी और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के लिए 1980 का पहला चुनाव था पर जनता लहर खत्म होने के बाद 1980 और 1985 का चुनाव तत्कालीन कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह के नाम रहा। 1980 के चुनाव में कांग्रेस को 246 व भाजपा को मात्र 60 सीट मिली और 1985 में भाजपा को 58 सीटें मिलीं। दोनों चुनाव अर्जुन सिंह के चेहरे पर कांग्रेस ने लड़े और 320 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने एकतरफा जीत हासिल क

1990 में पटवा दौर

संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जीत मिली और उसके 220 विधायक जीते। यह चुनाव भाजपा ने सुंदरलाल पटवा को आगे रखकर लड़ा था, पर पटवा सरकार मात्र दो साल ही चल पाई और बाबरी विध्वंस के बाद 1992 में बर्खास्त कर दी गई।

2003 का श्रेय उमाभारती के नाम

लगभग 11 साल बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट कर साध्वी उमा भारती को आगे बढ़ाया। इस चुनाव में भाजपा एकतरफा रिकॉर्ड मतों से जीती। भाजपा को 173 और कांग्रेस को मात्र 38 सीटें मिलीं।

दिग्विजय सिंह दौर 1993 से 2003 तक

राष्ट्रपति शासन के दौरान 1993 में जब चुनाव हुआ तो प्रदेश में कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। एक बार फिर कांग्रेस का दौर आया और दस साल तक पार्टी ने राज किया। 1998 में भी कांग्रेस ने दिग्विजय का चेहरा सामने रखकर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

तीन चुनाव शिवराज ने लड़े

भाजपा ने 2008 से लेकर 2018 तक तीन चुनाव में शिवराजसिंह चौहान के चेहरे पर लड़े। दो चुनाव में तो पार्टी को भारी जीत मिली, लेकिन 2018 में कांग्रेस को मामूली बढ़त मिली। 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लगभग 13 साल तक सारे चुनाव में सिर्फ शिवराज ही चले। 2014 के लोकसभा चुनाव भी मोदी-शिवराज के नाम पर भाजपा ने लड़ा, पर 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में कोई न चमत्कारिक नेता है और न ही कोई लहर।

मोदी वापस आ रहे : अग्रवाल

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं कि नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा कार्यकर्ता, वॉलेंटियर और जनता अभियान छेड़े हुए है। यही कारण है कि कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष सकते में है। तमाम सर्वे और रिपोर्ट्स भी बता रही हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार की वापसी तय है।

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