राष्ट्र गान के रचयिता Rabindranath Tagore की पुण्यतिथि पर जानें उनके जीवन की रोचक Story

राष्ट्र गान के रचयिता, कवि, साहित्यकार, फिलॉसफर और नोबल पुरस्कार से सम्मानित रबीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि पर देश उन्हें नमन कर रहा है

नई दिल्ली: राष्ट्र गान के रचयिता, कवि, साहित्यकार, फिलॉसफर और नोबल पुरस्कार (Nobel Puraskar) से सम्मानित रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की पुण्यतिथि पर देश उन्हें नमन कर रहा है। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लगभग 2,230 गीतों की रचना की है।

बांग्ला साहित्य (Bangla literature) के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूंकने वाले युगदृष्टा थे रबीन्द्रनाथ टैगोर। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी 2 रचनाएं 2 देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ गुरुदेव की ही रचनाएं हैं।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता शारदा देवी थीं। उनकी शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लंदन विश्वविद्यालय (University of London) में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश पुनः लौट आए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ।

 

 

संगीत में रूचि

रबीन्द्रनाथ ठाकुर बचपन से ही उनकी कविता, छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता 8 वर्ष की आयु में लिखी थी और सन् 1877 में केवल 16 वर्ष की आयु में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएं, यात्रावृन्त (Travelogue), नाटक और सहस्रो गाने भी लिखे हैं। वे अधिकतम अपनी पद्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

गद्य में लिखी उनकी छोटी कहानियां बहुत लोकप्रिय रही हैं। टैगोर ने इतिहास, भाषाविज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ी पुस्तकें भी लिखी थीं। टैगोर के यात्रावृन्त, निबंध, और व्याख्यान कई खंडों में संकलित किए गए थे, जिनमें यूरोप के जटरिर पत्रों और ‘मनुशर धर्म’ शामिल थे। अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) के साथ उनकी संक्षिप्त बातचीत, ‘वास्तविकता की प्रकृति पर नोट’ (Note on the nature of reality), बाद के उत्तरार्धों के एक परिशिष्ट के रूप में सम्मिलित किया गया है। 7 अगस्त 1941 को उनकी मृत्यु हो गई।

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