तिब्बती धर्मगुरू Dalai Lama के 86वें जन्मदिन पर जानें Motivate करने वाले उनके संदेश

तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के 86वें जन्मदिन पर प्रधानमंत्री मोदी और अखिलेश यादव ने बधाई दी है

नई दिल्ली: तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा (Dalai Lama)  के 86वें जन्मदिन पर प्रधानमंत्री मोदी ने बधाई दी है। उन्होंने कहा हम उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने भी दलाई लामा को शुभकामनाएं दी है। उन्होंने कहा कि संपूर्ण विश्व को सत्य, प्रेम, अहिंसा व मानवता का संदेश देने वाले बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।

दलाई लामा का जन्म

14वें दलाई लामा तिब्बत (Tibet) के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था। 2 वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं।

बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है। हर तिब्बती परमपावन दलाई लामा के साथ गहरा और  Inexplicable connection रखता है। तिब्बतियों के लिए परमपावन समूचे तिब्बत के प्रतीक हैं।

 

तिब्बत में भूमि के सौंदर्य, नदियों व झीलों की पवित्रता, आकाश की पुनीतता, पर्वतों की दृढ़ता वहां के लोगों की ताकत का। तिब्बत की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने हेतु परमपावन दलाई लामा को वर्ष 1989 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने लगातार अहिंसा की नीति का समर्थन करना जारी रखा है, यहां तक कि अत्यधिक दमन की परिस्थिति में भी। शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना परमपावन दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिधांत है।

दलाई लामा के संदेश-

  • बौद्ध धर्म का प्रचार – मेरा धर्म साधारण है, मेरा धर्म दयालुता है।
  • अपने पर्यावरण की रक्षा हमें उसी तरह से करना चाहिए जैसा कि हम अपने घोड़ों की करते हैं। हम मनुष्य प्रकृति से ही जन्मे हैं इसलिए हमारा प्रकृति के खिलाफ जाने का कोई कारण नहीं बनता, इस कारण ही मैं कहता हूं कि पर्यावरण धर्म नीतिशास्त्रा या नैतिकता का मामला नहीं है। यह सब ऐसी विलासिताएं हैं जिनके बिना भी हम गुजर-बसर कर सकते हैं लेकिन यदि हम प्रकृति के विरफ जाते हैं तो हम जिंदा नहीं रह सकते।
  • अपने पर्यावरण की रक्षा हमें उसी तरह से करना चाहिए जैसा कि हम अपने घोड़ों की करते हैं। हम मनुष्य प्रकृति से ही जन्मे हैं इसलिए हमारा प्रकृति के खिलाफ जाने का कोई कारण नहीं बनता इस कारण ही मैं कहता हूं कि पर्यावरण धर्म नीतिशास्त्रा या नैतिकता का मामला नहीं है।

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