समाजिक व प्राकृतिक संतुलन के लिए पितृ पक्ष का आयोजन

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डा. राधेश्याम द्विवेदी

जेठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी और बरसात के सावन-भादौ महीनों में अतिवृष्टि होने से मानव परिवेश तथा पर्यावरण में काफी परिवर्तन व बदलाव देखने को मिलता है। इसे संतुलित एवं सामान्य करने के लिए हमारे पूर्वजों एवं मनीषियों ने अश्विन (क्वार) मास में दो महत्वपूर्ण एवं शोधपरक पक्ष (या पखवारे) का प्राविधान किया है। मैं यह सब किसी प्रमाणिक दावे या संदर्भ के साथ तो नहीं कह सकता परन्तु जैसा मैं स्वयं अनुभव किया हॅू उसके आधार पर अपनी बात प्रत्यक्ष करने की धृष्टता कर रहा हॅू।

ये पखवारा पितृ पक्ष तथा देव पक्ष के रुप में जान सकते हैं। भारत में गर्मी व बरसात में धन धान्य की प्रचुरता कम होती है। इस कमी को दूर करने तथा अपने पूर्वजों को मान सम्मान देने के लिए वनस्पतियों को साफ व शोधन करने के लिए तथा बन्य जीव व प्राणियों को पुनः जीवन्त बनाने के लिए इन दोनों पक्षों में अनेक तरह के धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान किये जाते है।

जहां पितृ पक्ष में पूर्वजों के सम्मान में प्राकृतिक संतुलन का एक प्रयास किया जाता हैं वही देव पक्ष में अपने आराध्यों की पूजा करके एक नयी उर्जा धारणकर संसारिक कार्य का संचालन व गति प्रदान किया जाता है। प्रकृति , पशु व जानवर हमारी लापरवाही से तिरस्कृत हो जाते हैं तो उन्हें पुनः पूर्ववत संस्थापित करने के लिए पितृ पक्ष के विविध धार्मिक अनुष्ठान किये जाते है। इन अनुष्ठानों में इन प्रकृतियों को विशेष रुप से जोड़ा जाता है। इसी प्रकार देव पक्ष मंत जहां नव रात्रि तथा दशहरा आदि के कार्यक्रम भी परिवेशगत संतुलन के साथ साथ अपने अराध्य देव देवी के प्रति सम्मान प्रकट करने का साधन भी माना जा सकता है। जगत के माता पिता की हम इस रुप में अपना आाभार व्यक्त करते है-

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥

(For the right comprehension of words and their senses, I salute Parvati and Parameshwara, the parents of the world, who are perpetually united like words and their meanings)

यहाँ पितरौ शब्द की व्याख्या में माता भी छिपी हुई है। ‘माता च पिता च = पितरौ’। स्त्रीत्व के गुण और पुरुत्व के गुण एक मानव में एकत्र होते हैं, वहीं मानव ज्ञान का परमोच्च रूप है। केवल नारी के गुण मुक्ति के लिए उपयोगी नहीं हैं। मुक्ति पाने के लिए नर और नारी के गुण इकट्ठे आने चाहिए। इसलिए द्वैत निर्माण होते ही भगवान में नारनारी दोनों के गुण एकत्र हुए। उमा-महेश्वर में पौरुष, कर्तव्य, ज्ञान और विवेक जैसे नर के गुण हैं, उसके साथ-साथ स्नेह, प्रेम, वात्सल्य जैसे नारी के गुण भी हैं, इसलिए वह पूर्ण जीवन है। वाक्-वाणी एवं उसका अर्थ मिलकर हुए वागर्थ। ये आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं।

ऐसे वागर्थ की तरह जुड़े हुए, संसार के माता-पिता पार्वती एवं परमेश्वर की मैं वंदना करता हूं, वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के लिए। वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के प्रयास में मैं भी लगा हुआ हूं। कुछ समझा भी बाकी का शेष है। जब कालिदास,तुलसीदास जी जैसे लोग लगे हुए रहे तो मुझे देर लग रही है तो इसमें बहुत घबराने की बात नहीं है। बात ही बहुत तगड़ी है- पहले तो वाक् एवं उसके अर्थ के स्वरूप को समझना, फिर वाक् एवं उसके अर्थ के बीच जुड़ाव को समझना, फिर इस संसार में इनकी व्यापक भूमिका को पहचानना होगा तब जा कर कहा सकूंगा कि हां, अब मैं ने भी ठीक से समझ लिया है।

पितृ पक्ष में श्राद्ध फल से ना सिर्फ हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है बल्कि हमें विशेष रुप से हमारे पितर हमारे जीवन सुख शांती के लिए आशीर्वाद भी देते हैं। इसलिए हमें आवश्यक रुप से वर्ष भर में पितरों की मृत्युतिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करना चाहिए और सामर्थ्यानुसार ब्राह्मण देव को भोजन प्रसाद ग्रहण करवाना चाहिए व पुण्य के भागी बनना चाहिए। पितृ पक्ष करीब 15 दिन चलता है और इस दौरान लोग अपने पितरों की शान्ति के लिए पिंड दान, तर्पण और उनके निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध को पूरी श्रदा से करते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता व परिवार के मृतकों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध कर्म को पितृ कर्म भी कहा जाता है। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध करके उन्हें खुश किया जाता है और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। श्राद्ध की विधियों को पूरा करने के लिए पुजारी या पंडितों की सहायता ली जाती है।

इस दौरान ध्यान रखना चाहिए कि किसी प्रकार से पितरों को नाराज ना किया जाए इससे पितरों का दोष लग सकता है। इससे घर में संतान का सुख, वंश वृद्धि, परिवार अस्थिरता, मानसिक तनाव आदि से गुजरना पड़ सकता है। मत्स्यपुराण के अनुसार अगर पग-पग पर जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो इसका संकेत है कि आपके घर में पितृ दोष है यानि आपसे आपके पितृ अतृप्त हैं। श्राद्ध के दौरान अगर जरा-सी चूक हो जाए तो इन सब समस्याओं से गुजरना पड़ सकता है। हमेशा अपने पितरों को खुश रखने के लिए श्राद्ध को विधिवत तरीके से पूर्ण करना चाहिए।

पितृविसर्जन मूलतः पितृपक्ष की समापन बेला हैं। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितृ धरती पर उतरते हैं और पितृविसर्जन यानि श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को पितृ हमसे विदा हो जाते हैं। कहते हैं कि जो अपने अस्तित्व को सम्मान देकर पितृ को प्रतीक स्वरूप अन्न जल प्रदान करता है, उससे प्रसन्न होकर पितृ सहर्ष शुभाशिष प्रदान कर अपने लोक में लौट जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करने से व्यक्ति को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिससे घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है। मान्यता है कि अगर पितृ रुठ जातें है तो व्यक्ति को जीवन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से भी समस्यओं का सामना करना पड़ता है।

पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन धरती पर पधारे पितरों को याद करके उनकी विदाई की जाती है। पूरे पितृ पक्ष में पितरों को याद न किया गया हो तो अमावस्या को उन्हें याद करके दान करने और गरीबों को भोजन कराने से पितरों को शांति मिलती है। वेदों में बताए गए विधान के अनुसार शाम को जप, हवन एवं तर्पण अवश्य करना चाहिए। इसलिए ब्रह्माजी ने श्रृष्टि निर्माण में पितृलोक का निर्माण किया है। पितृ आराधना का समय निर्धारित किया है। पितृ पक्ष में गया श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, ब्रम्हकपाली श्राद्ध किया जाता है। हम मनुष्य को लोक में पितरों के नियम से जो भी श्राद्ध और कर्म करते हैं वो हमारे पितरों को अनंत गुना होकर मिलता है और वो हमें आर्शीवाद प्रदान करते हैं।

घर में किया गया तर्पण एक गुना व पवित्र पुनीत नदियों नर्मदा गंगा आदि में किया गया तर्पण अनंत गुना होता है। हमें अपने पूर्वजों व मनीषियों द्वारा बताये गये नियमों व अनुष्ठानों को श्रद्धा के साथ अनुसरण करना चाहिए। इसे कभी भी जबरन थोपा हुआ नहीं मानना चाहिए। इस नियम से कई निरीह तथा जरुरत मन्द जीवों की मदद भी होती है और निजी संचित धन का उपयोग सामाजिक व जरुरतमन्द लोगों के हित के रुप में भी हो जाता है। जिसे हम स्वेच्छया ना कर सकते हैं उसे धार्मिक अनुष्ठान के रुप में जरुर कर सकते हैं। हमारे व्यवस्थाकारों ने जो भी नियम व आचार विचार बनाये हैं वह बहुत ही सोच समझकर तथा अनुशीलन करके बनाये है। पित् पक्ष की ही तरह देव पक्ष के विविध आयोजनों में अपनी क्षमता सामथ्र्य के अनुसार सह – भागिता निभानी चाहिए।

 

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