पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी ‘गरीब कल्याण वर्ष’

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डा. राधेश्याम द्विवेदी

विशुद्ध भारतीय मनीषी :-  पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक भारतीय विचारक, अर्थ शास़्त्री, समाज शास़्त्री इतिहासकार और पत्रकार थे. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई और भारतीय जनसंघ (वर्तमान, भारतीय जनता पार्टी) के अध्यक्ष भी बने। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। उनको जनसंघ के आर्थिक नीति के रचनाकार बताया जाता है। आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य समान्य मानव का सुख है या उनका विचार था।

विचार–स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है। इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद, अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं। चराचर जगत को सन्तुलित , स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन –कला व जीवन–दर्शन है। इन्होने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत द्वारा पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता और पश्चिमी लोकतंत्र का आँख बंद कर समर्थन का विरोध किया। यद्यपि उन्होंने लोकतंत्र की अवधारणा को सरलता से स्वीकार कर लिया, लेकिन पश्चिमी कुलीनतंत्र, शोषण और पूंजीवादी मानने से साफ इनकार कर दिया था। इन्होंने अपना जीवन लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाने और जनता की बातों को आगे रखने में लगा दिया।

प्रारंभिक जीवन :- दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को नगला चन्द्रभान, मथुरा, (उत्तर प्रदेश) में एक मध्यम वर्गीय प्रतिष्ठित हिंदू परिवार में हुआ था। उनके परदादा का नाम पंडित हरिराम उपाध्याय था, जो एक प्रख्यात  ज्योतिषी थे. उनके पिता का नाम श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा मां का नाम रामप्यारी था। उनके पिता जलेसर में सहायक स्टेशन मास्टर के रूप में कार्यरत थे और माँ बहुत ही धार्मिक विचारधारा वाली महिला थीं। इनके छोटे भाई का नाम शिवदयाल उपाध्याय था। जब उनकी उम्र मात्र ढाई वर्ष की थी तो उनके पिता का असामियक निधन हो गया। इसके बाद उनका परिवार उनके नाना के साथ रहने लगा। यहां उनका परिवार दुखों से उबरने का प्रयास ही कर रहा था कि तपेदिक रोग के इलाज के दौरान उनकी माँ दो छोटे बच्चों को छोड़कर संसार से चली गयीं।

सिर्फ यही नहीं जब वे मात्र 10 वर्षों के थे तो उनके नाना का भी निधन हो गया। उनके मामा ने उनका पालन पोषण अपने ही बच्चों की तरह किया। छोटी अवस्था में ही अपना ध्यान रखने के साथ-साथ उन्होंने अपने छोटे भाई के अभिभावक का दायित्व भी निभाया परन्तु दुर्भाग्य से भाई को चेचक की बीमारी हो गयी और 18 नवंबर, 1934 को उसका निधन हो गया। दीनदयाल ने कम उम्र में ही अनेक उतार-चढ़ाव देखा, परंतु अपने दृढ़ निश्चय से जिन्दगी में आगे बढ़े. उन्होंने सीकर से हाई स्कूल की परीक्षा पास की. जन्म से बुद्धिमान और उज्ज्वल प्रतिभा के धनी दीनदयाल को स्कूल और कॉलेज में अध्ययन के दौरान कई स्वर्ण पदक और प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा जीडी बिड़ला कॉलेज, पिलानी, और स्नातक की की शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय के सनातन धर्म कॉलेज से पूरी की। इसके पश्चात उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा पास की लेकिन आम जनता की सेवा की खातिर उन्होंने इसका परित्याग कर दिया।

आर.एस.एस. के साथ सम्बन्ध :- दीनदयाल उपाध्याय अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों से ही समाज सेवा के प्रति अत्यधिक समर्पित थे। वर्ष 1937 में अपने कॉलेज के दिनों में वे कानपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के साथ जुड़े. वहां उन्होंने आर.एस.एस. के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से बातचीत की और संगठन के प्रति पूरी तरह से अपने आपको समर्पित कर दिया। वर्ष 1942 में कॉलेज की शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने न तो नौकरी के लिए प्रयास किया और न ही विवाह का, बल्कि वे संघ की शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आर.एस.एस. के 40 दिवसीय शिविर में भाग लेने नागपुर चले गए।

जनसंघ के साथ सम्बन्ध :- भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा वर्ष 1951 में किया गया एवं दीनदयाल उपाध्याय को प्रथम महासचिव नियुक्त किया गया। वे लगातार  दिसंबर 1967 तक जनसंघ के महासचिव बने रहे। उनकी कार्यक्षमता, खुफिया गतिधियों और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनके लिए गर्व से सम्मानपूर्वक कहते थे कि – ‘यदि मेरे पास दो दीनदयाल हों, तो मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता हूं’। परंतु अचानक वर्ष 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के असमय निधन से पूरे संगठन की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के युवा कंधों पर आ गयी। इस प्रकार उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक महासचिव के रूप में जनसंघ की सेवा की। भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को दिसंबर 1967 में कालीकट में जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

एक लेखक के रूप में :- उपाध्यायजी पत्रकार तो थे ही चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी असामयिक मृत्यु से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जिस धारा में वह भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी जिसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में ही दे दिया था। तभी तो कालीकट अधिवेशन के बाद विश्व भर के मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया। दीनदयाल उपाध्याय के अन्दर की पत्रकारिता तब प्रकट हुई जब उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ में वर्ष 1940 के दशक में कार्य किया। अपने आर.एस.एस. के कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांचजन्य और एक दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ शुरू किया था। उन्होंने नाटक ‘चंद्रगुप्त मौर्य’और हिन्दी में शंकराचार्य की जीवनी लिखी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. के.बी. हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। उनकी अन्य प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों में ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, ‘जगतगुरू शंकराचार्य’, ‘अखंड भारत क्यों हैं’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’, ‘राष्ट्र चिंतन’और ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’आदि हैं।

लोकतंत्र और समाज के प्रति विचार :- दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा थी कि आजादी के बाद भारत का विकास का आधार अपनी भारतीय संस्कृति हो न की अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी पश्चिमी विचारधारा। हालांकि भारत में लोकतंत्र आजादी के तुरंत बाद स्थापित कर दिया गया था, परंतु दीनदयाल उपाध्याय के मन में यह आशंका थी कि लम्बे वर्षों की गुलामी के बाद भारत ऐसा नहीं कर पायेगा। उनका विचार था कि लोकतंत्र भारत का जन्मसिद्ध अधिकार है न की पश्चिम (अंग्रेजों) का एक उपहार। वे इस बात पर भी बल दिया करते थे कि कर्मचारियों और मजदूरों को भी सरकार की शिकायतों के समाधान पर ध्यान देना चाहिए। उनका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करना प्रशासन का कर्तव्य होना चाहिए। उनके अनुसार लोकतंत्र अपनी सीमाओं से परे नहीं जाना चाहिए और जनता की राय उनके विश्वास और धर्म के आलोक में सुनिश्चित करना चाहिए।

‘एकात्म मानववाद‘ की अवधारणा :- दीनदयाल द्वारा स्थापित ‘एकात्म मानववाद’ की अवधारणा पर आधारित राजनितिक दर्शन भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) की देन है. उनके अनुसार ‘एकात्म मानववाद’ प्रत्येक मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक एकीकृत कार्यक्रम है। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत पश्चिमी अवधारणाओं जैसे- व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद पर निर्भर नहीं हो सकता है। उनका विचार था कि भारतीय मेधा पश्चिमी सिद्धांतों और विचारधाराओं से घुटन महसूस कर रही है, परिणामस्वरूप मौलिक भारतीय विचारधारा के विकास और विस्तार में बहुत बाधा आ रही है।

रहस्यमय निधन :- 19 दिसंबर 1967 को दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। 11 फ़रवरी, 1968 की सुबह मुग़ल सराय रेलवे स्टेशन पर दीनदयाल का निष्प्राण शरीर पाया गया। इसे सुनकर पूरे देश दु:ख में डूब गया। इस महान नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए राजेंद्र प्रसाद मार्ग पर भीड़ उमड़ पड़ी। उन्हें 12 फरवरी, 1968 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई। आजतक उनकी मौत एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है।

जन्म शताब्दी ‘गरीब कल्याण वर्ष’ के रूप में :- यूपी में दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष को ‘गरीब कल्याण वर्ष’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी के स्मरणोत्सव के लिए किया दो समितियों का गठन किया गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एक 149 सदस्यीय राष्ट्रीय समिति की अध्यक्ष, केन्द्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा समिति के संयोजक और गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह एक 23 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति की अध्यक्ष हैं। राष्ट्रीय समिति के सदस्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री श्री एच. डी. देवे गौड़ा, केन्द्रीय मंत्री श्री राजनाथ सिंह, श्रीमती सुषमा स्वराज, श्री अरुण जेटली, श्री मनोहर पार्रिकर, पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह को शामिल किया गया है। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार, पूर्व कृषि मंत्री श्री शरद पवार, राज्यसभा सांसद श्री शरद यादव, योग गुरु बाबा रामदेव, गीतकार प्रसून जोशी, फिल्म निर्देशक श्री चन्द्रप्रकाश द्विवेदी, पूर्व हॉकी खिलाड़ी श्री धनराज पिल्लै, पूर्व बैडमिन्टन खिलाड़ी और कोच श्री पुलैला गोपीचंद और सुलभ इंटरेशनल के संस्थापक श्री बिंदेश्वर पाठक को भी राष्ट्रीय समिति में शामिल किया गया है।

भारत के पूर्व मुख्य न्यायधीश श्री आर. सी. लाहोटी, रिटायर्ड वायु सेना प्रमुख मार्शल श्री एस. कृष्णास्वामी, संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप और पर्यावरणविद श्री सी. पी. भट्ट को भी राष्ट्रीय समिति में शामिल किया गया है। समिति में बहुत से राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं को भी शामिल किया गया है। यूपी की भाजपा सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष को ‘गरीब कल्याण वर्ष’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दीनदयाल उपाध्याय को युगपुरुष बताते हुए कहा, “उनका मानना था कि हमारी राजनीति राष्ट्र के लिए है और सत्ता सेवा के लिए, सत्ता समाज के अंतिम व्यक्ति के विकास तक पहुंचने के लिए है। इसी सिद्धांत को मूल रूप देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीड़ा उठाया है, प्रदेश सरकार इसे आगे बढ़ाएगी।”

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