पराक्रम दिवस: ‘1945 में नहीं हुई थीं नेताजी’ की मृत्यु?, जानें मौत का रहस्य

'नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’ (Subhash Chandra Bose) जी का आज 125वीं जयंती है, जिस देश पराक्रम दिवस के रूप में मना रहा है, नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है

नई दिल्ली: भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सबसे सबसे बड़े कद्दावर ‘नेता सुभाष चन्द्र बोस’ (Subhash Chandra Bose) जी का आज 125वीं जयंती है। द्वितीय विश्वयुद्ध(Second World War) के दौरान, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिये उन्होंने जापान के सहयोग से ‘आज़ाद हिन्द फौज’ का गठन किया था।

नेताजी का बांग्ला नाम

सुभाष चन्द्र बोस का बांग्ला नाम शुभाष चॉन्द्रो बोशु है। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था और 18 अगस्त 1945 को इनकी मृत्यु हो गई। उनके द्वारा दिया गया ‘जय हिन्द का नारा’ भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा” का नारा भी उनका था जो उस समय सबसे ज्यादा प्रचलन (Trend) में आया। भारत के लोग उन्हें ‘नेताजी’ का नाम दिया और तब से हि लोग उन्हें प्यार से ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ के नाम से पुकारने लगे।

 

गुप्तचरों द्वारा जान से मारने का आदेश

इतिहासकारों (Historians) का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की थी तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों (Detectives) को 1941 में उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया था।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस  ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। नेताजी जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस जी ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी। जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी।

अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त 

1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों (Indian Territories) को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था।

6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण (Broadcasting) जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनायें मांगीं।

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नेताजी की मृत्यु का रहस्य

नेताजी ‘सुभाष चन्द्र बोस’ की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है। जापान में हर साल 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नजरबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से सम्बंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किये?

खुफिया दस्तावेज

16 जनवरी 2014 को कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिये स्पेशल बेंच के गठन का आदेश दिया।

पराक्रम दिवसका गठन

‘आजाद हिंद सरकार’ के 75 साल पूर्ण होने पर इतिहास मे पहली बार साल 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके बाद आज हि के दिन यानि कि 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयंती है जिसे भारत सरकार ने ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसलिए देश आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मना रहा है।

125वीं जयंती पर PM मोदी ने किया नमन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि महान स्वतंत्रता सेनानी और भारत माता के सच्चे सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी जन्म-जयंती पर शत-शत नमन। कृतज्ञ राष्ट्र देश की आजादी के लिए उनके त्याग और समर्पण को सदा याद रखेगा।

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