पेट पालने के लिए मां-बाप ने मासूम को बनाया अपना मोहरा

आदिवासी इलाकों में जीवन कितना मुश्किल है, इसका अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि जीवन यापन के लिए आदिवासी समुदाय में बच्चों को गिरवी रख दिया जाता है। बारां के साथ कई आदिवासी जिलें में आदिवासी समाज में यह अजब रवायत आज भी है।

आपको बता दें भील समाज के गांव आनासागर, रानीपुरा, हाड़ोता, उचावत, मंगलपुरा, खूंटी, बलारपुर, आदि गांवों के 50 से ज्यादा बच्चे रेबारियों के पास गिरवी हैं। जगह-जगह भेड़ निष्क्रमण के दौरान रेवड़ के साथ यह बच्चे सहज दिख जाते हैं।

जानकारी के मुताबिक एक गांव के शामू और रमेश के पिता की 3-4 वर्ष पहले बीमारी से मौत हो गई. मां नाते चली गई। चाचा की हैसियत इन्हें पालने की थी नहीं, सो उसने दोनों भाइयों को रेबारियों को 30 हजार रुपए साल में गिरवी रख दिया। वहीं दूसरे मामले में शाहाबाद इलाके के एक गांव में दो वर्ष पहले दीन्या की पत्नी की मौत हुई। क्रियाकर्म और अन्य कामों पर 30 हजार रुपए खर्च हो गए। इतने रुपयों की व्यवस्था कैसे होती सो दीन्या ने अपने 14 वर्ष के बेटे को भेड़ें चराने के लिए गिरवी रख दिया।

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