पितृ पक्ष 2021: पितृ पक्ष प्रारंभ, जानिए क्यों आवश्यक है श्राद्ध करना और वास्तु के अनुसार श्राद्ध के क्या हैं नियम ?

।।मातृदेवो भव पितृदेवो भव।।

पितरो की शांति के लिए क्या करे?

समाधान:– पितरो की शांति हेतु त्रिपिण्डी श्राद्ध, नारायण बलि कर्म, महामृत्युंजय मंत्र जाप और श्रीमद् भागवत कथा कराये।

(1) त्रिपिण्डी श्राद्ध:— यदि किसी मृतात्मा की लगातार तीन वर्षों तक श्राद्ध नहीं किया जाए तो वह जीवात्मा प्रेत योनि में चली जाती है। ऐसी प्रेतात्माओं की शांति के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध कराया जाता है।

(2) नारायण बलि कर्म:— यदि किसी जातक की कुण्डली में पित्रृदोष है एवं परिवार मे किसी की असामयिक या अकाल मृत्यु हुई हो तो वह जीवात्मा प्रेत योनी में चला जाता है एवं परिवार में अशांति का वातावरण उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में नारायण बलि कर्म कराना आवश्यक हो जाता है।

(3) मृतात्मा की शांति के लिए भी “महामृत्युंजय मंत्र” का जप करवाया जा सकता है। इसके प्रभाव से पूर्व जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते है।

(4)पितरो की आत्मा की शांति के लिए :–

“श्रीमद्भागवतपुराण का पाठ एवं कथा” कराना चाहिए।श्रीमद् भागवत कथा सुनने से प्रेत योनि से मुक्ति हो जाती है।और परिवार के लिए सुख शांति प्राप्त होती है।

➡सोलह श्राद्ध का संयोग इस वर्ष 17 दिन का होगा! हर साल पितरों की शांति और तर्पण करने के लिए भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल में किया जाता है।

पूर्वजों का तपर्ण करना सनातन धर्म में बहुत ही पुण्य का काम माना जाता है। पुण्य के साथ तर्पण हिन्दू धर्म में बहुत अहम काम माना जाता है। सनातन धर्म मान्यता के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है। मान्यता है कि अगर मृत मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना हो पाए तो उसे इस मृत्यु लोक (पृथ्वी लोक) से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत बनकर इस पृथ्वी पर भटकता रहता है, जिसे अन्य शब्दों में कहते हैं कि मोक्ष प्राप्त नहीं होता।और उसकी सदगति नहीं होती है ।

तर्पण का महत्व

पुराणों में एक पुराण है “ब्रह्म वैवस्वत” जिसके अनुसार:– भगवान को खुश करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना अति आवश्यक है। ज्योतिष के अनुसार भी कुंडली में पितृ दोष पाया जाता है। जिसे अब तक का सबसे बड़ा दोष माना गया है। यह दोष यदि एकबार लग जाए तो पीढ़ी दर पीढ़ी कुंडली में दिखता है। जब तक की कोई इसकी शांति न करवाए। हर साल पितरों की शांति और तर्पण करने के लिए भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल में किया जाता है। इसे ही पितृ पक्ष श्राद्ध कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन पितृ पक्ष के दिनों में कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।

श्राद्ध का महत्व👇👇

आइये जानते हैं पुराणों के अनुसार श्राद्ध का महत्व:–

कुर्मपुराण :– कुर्मपुराण में कहा गया है कि ‘जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता।’

गरुड़ पुराण :– इस पुराण के अनुसार ‘पितृ पूजन (श्राद्धकर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।

मार्कण्डेय पुराण :– इसके अनुसार ‘श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या ,सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।

ब्रह्मपुराण :– इसके अनुसार ‘जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं होता।’ साथ ही ब्रह्मपुराण में वर्णन है कि ‘श्रद्धा एवं विश्वास पूर्वक किए हुए श्राद्ध में पिण्डों पर गिरी हुई पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदों से पशु-पक्षियों की योनि में पड़े हुए पितरों का पोषण होता है। जिस कुल में जो बाल्यावस्था में ही मर गए हों, वे सम्मार्जन के जल से तृप्त हो जाते हैं।

श्राद्ध पक्ष में सूर्य पूजन 🌞

पितर पक्ष में इस मंत्र के द्वारा सूर्य भगवान को अर्ध्य देने से यमराज प्रसन्न होकर पूर्वजों को अच्छी(स्वर्ग लोक) जगह भेज देते हैं ।

🌷 ॐ धर्मराजाय नमः ।
🌷 ॐ महाकालाय नमः ।
🌷 ॐ म्रर्त्युमा नमः ।
🌷 ॐ दानवैन्द्र नमः ।
🌷 ॐ अनन्ताय नमः ।

श्राद्ध विशेष🌺🌻

जो कर्म श्रद्धापूर्वक किया जाय उसे श्राद्ध कहते हैं । इसलिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।

भगवान सूर्य कहते हैं :– जो व्यक्ति श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा न तो मैं, न ही कोई देवता ग्रहण करते हैं । श्राद्ध न करनेवाला घोर तामिस्त्र आदि नरक पाता है और अंत में सूकर की योनि में उत्पन्न होता है ।

देवताओं को अन्न का भाग देने के लिए मंत्र के पीछे “स्वाहा” शब्द का और पितरों को भाग देने के लिए श्राद्ध में (3) तीन बार “स्वधा”शब्द का उच्चारण करना चाहिए ।

श्राद्ध कर्म में तीन वस्तुएँ अत्यंत पवित्र मानी गई हैं :–

1⃣ काले तिल
2⃣ दौहित्र (पुत्री का पुत्र)
3⃣ कुतप (दिन के आठवे प्रहर में जब सूर्य का ताप घटने लगता है, उस समय को कुतप कहते हैं) । उसमें पितरों को दिया हुआ दान अक्षय होता है ।

गाय का दही, दूध, घी व शक्कर आदि से युक्त अन्न पितरों के लिए तृप्तिकारक होते हैं । शहद मिलाकार तैयार किया हुआ कोई भी पदार्थ तथा गाय का घी व दूध मिलाकर बनाई हुई खीर भी पितरों को दी जाय तो वह अक्षय होती है ।

पितरों को क्या प्रिय है और क्या अप्रिय

प्रिय वस्तु:–

कुश, साठी चावल, जौ,काले तिल, गन्ना, मूंग, सफ़ेद फूल,गुड़, शहद, गाय का दूध एवं घी ये वस्तुएँ पितरों को सदा प्रिय हैं अतः श्राद्ध में इनका उपयोग अवश्य करें ।

अप्रिय वस्तु:–

मसूर, मटर, कमल, बिल्व, धतूरा, भेड़-बकरी का दूध ये वस्तुएँ पितरो को सदा अप्रिय हैं,अत: इन वस्तुओं का उपयोग श्राद्ध में कदापि न करें।

यदि श्राद्ध न कर सकें तो?🌻

➡ न कर पाएं श्राद्ध तो करें इनमें से कोई एक उपाय, नहीं होंगे पितृ दोष से पीड़ित।

जिस स्थान पर आप पीने का पानी रखते हैं, वहां रोज शाम को शुद्ध घी का दीपक लगाएं। इससे पितरों की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। इस बात का ध्यान रखें कि वहां जूठे बर्तन कभी न रखें।

सर्व पितृ अमावस्या के दिन काले तिल व चावल के आटे के 5 पिंड बनाएं व इसे लाल कपड़े में लपेटकर नदी में बहा दें।

गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर उस पर गूगल के साथ घी, जौ, काले तिल व चावल मिलाकर घर में धूप करें।

विष्णु भगवान के किसी मंदिर में सफेद तिल के साथ कुछ दक्षिणा (रुपए) भी दान करें।

कच्चे दूध, जौ, काले तिल व चावल मिलाकर नदी में बहा दें। ये उपाय सूर्योदय के समय करें तो अच्छा रहेगा।

श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराएं या सामग्री जिसमें आटा, घी, फल, गुड़, सब्जी और दक्षिणा दान करें।

श्राद्ध नहीं कर सकते तो किसी नदी में काले तिल डालकर तर्पण करें। इससे भी पितृ दोष में कमी आती है।
श्राद्ध पक्ष में किसी विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने से पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।

श्राद्ध पक्ष में पितरों को याद कर गाय को हरा चारा खिला दें। इससे भी पितृ प्रसन्न व तृप्त हो जाते हैं।

सूर्यदेव को अर्ध्य देकर प्रार्थना करें कि आप मेरे पितरों को श्राद्धयुक्त प्रमाण पहुँचाए और उन्हें तृप्त करे।

पितृ पक्ष में दान का महत्व🌻🌹

पितृ पक्ष के दिनों में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि कर्म कर पितरों को प्रसन्न किया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में दान का भी बहुत महत्व है। मान्यता है कि दान से पितरों की आत्मा को संतुष्टि मिलती है और पितृ दोष भी खत्म हो जाते हैं। श्राद्ध में गाय, तिल, भूमि, नमक, घी आदि दान करने की परंपरा है।

➡ इन सभी वस्तुओं को दान करने से अलग-अलग फल प्राप्त होते हैं। धर्म ग्रंथों में श्राद्ध में दान की गई वस्तु से मिलने वाले फलों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है, लेकिन बहुत कम लोग इस बारे में जानते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं श्राद्ध में क्या वस्तु दान करने से उसका क्या फल प्राप्त होता है-

1. गुड़ का दान- गुड़ का दान पूर्वजों के आशीर्वाद से कलह और दरिद्रता का नाश कर धन और सुख देने वाला माना गया है।

2. गाय का दान- धार्मिक दृष्टि से गाय का दान सभी दानों में श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन श्राद्ध पक्ष में किया गया गाय का दान हर सुख और धन-संपत्ति देने वाला माना गया है।

3. घी का दान- श्राद्ध में गाय का घी एक पात्र (बर्तन) में रखकर दान करना परिवार के लिए शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

4. अनाज का दान- अन्नदान में गेहूं, चावल का दान करना चाहिए। इनके अभाव में कोई दूसरा अनाज भी दान किया जा सकता है। यह दान संकल्प सहित करने पर मनोवांछित फल देता है।

5. भूमि दान- अगर आप आर्थिक रूप से संपन्न हैं तो श्राद्ध पक्ष में किसी कमजोर या गरीब व्यक्ति को भूमि का दान आपको संपत्ति और संतान लाभ देता है। किंतु अगर यह संभव न हो तो भूमि के स्थान पर मिट्टी के कुछ ढेले दान करने के लिए थाली में रखकर किसी ब्राह्मण को दान कर सकते हैं।

6. सोने का दान- सोने का दान कलह का नाश करता है। किंतु अगर सोने का दान संभव न हो तो सोने के दान के निमित्त यथाशक्ति धन दान भी कर सकते हैं।

7. वस्त्रों का दान- इस दान में धोती और दुपट्टा सहित दो वस्त्रों के दान का महत्व है। यह वस्त्र नए और स्वच्छ होना चाहिए।

8. चांदी का दान- पितरों के आशीर्वाद और संतुष्टि के लिए चांदी का दान बहुत प्रभावकारी माना गया है।

9. तिल का दान- श्राद्ध के हर कर्म में तिल का महत्व है। इसी तरह श्राद्ध में दान की दृष्टि से काले तिलों का दान संकट, विपदाओं से रक्षा करता है।

10. नमक का दान- पितरों की प्रसन्नता के लिए नमक का दान बहुत महत्व रखता है।

ब्राह्मणों को दान देते समय यह मंत्र बोलना चाहिए-

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।

दान करते समय यह श्लोक बोलकर श्रीहरि भगवान विष्णु से श्राद्धकर्म की शुभ फल की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करनी चाहिए।

श्राद्ध का किसे देना चाहिए🌺🌻

पद्मपुराण और कूर्म पुराण के अनुसार:– पूजन कर्म कराने वाले ब्राह्मण का परीक्षण कभी भी नहीं करना चाहिए । किन्तु श्राद्ध कर्म कराने वाले ब्राह्मण का एवं श्राद्ध का दान देते समय यह बात जरूर ही ध्यान में रखना चाहिए कि श्राद्ध लेने व श्राद्ध खाने वाला ब्राह्मण उस कार्य के योग्य है कि नहीं है? अर्थात- ब्राह्मण सुपात्र है अथवा कुपात्र?क्योंकि सुपात्र ब्राह्मण को दिया गया दान दानदाता को जीवन की समस्त ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है और दानदाता के पितर संतुष्ट होकर आशीर्वाद और साधुवाद देते हैं और इसके विपरीत कुपात्र को दिया गया दान दानदाता को रौरव आदि भयानक नरकों में ले जाता है और अंत में मनुष्य सूकर – कूकर की यौनि में उत्पन्न होता हैं।और कठिन से भी कठिन दु:ख का भोग करता है।

आचार्य स्वामी विवेकानन्द जी
ज्योतिर्विद, व सरस् श्रीमद्भागवत कथा व श्रीरामकथा व्यास श्री धाम श्री अयोध्या जी संपर्क सूत्र:-9044741252

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