छात्रा की येाग्यता से खुश हो कर जज ने भर दी छात्रा की फीस

लखनऊ: 29 नवंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के एक न्यायाधीश एक मेधावी दलित छात्रा की येाग्यता से खुश हो कर उन्होंने स्वयं अपनी जेब से उस छात्रा को फीस 15 हजार रूपये दे दिये।छात्रा बहुत गरीब थी जिसके के कारण समय वह फीस नहीं जमा कर पायी थी जिस कारण वह IIT में में एडमिशन नहीं ले पाई। इसके साथ ही अदालत ने ज्वाइंट सीट एलोकेशन अथारिटी एंव IIT बनारस हिन्दू विश्वविदयालय को भी निर्देश दिया कि इस छात्रा को तीन दिन के भीतर एडमिशन दिया जाये और यदि सीट न खाली रह गयी हो तो उसके लिए अलग से सीट की व्यवस्था की जाये।

यह आदेश जज दिनेश कुमार सिंह का था उन्होने सोमवार को छात्रा संस्कृति रंजन की याचिका पर सुनवायी करते हुए पारित किये। छात्रा इतनी गरीब है कि वह अपने लिए एक वकील का भी इंतजाम भी नहीं कर सकी थी। इस पर अदालत के कहने पर अधिवक्तागण सर्वेश दुबे एवं समता राव ने आगे आकर छात्रा का पक्ष रखने में अदालत का सहयेाग किया।

जाने की क्या है पूरा मामला

दरअसल छात्रा दलित है। उसके दसवीं में 95 प्रतिशत तथा बारहवीं में 94 प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे । वह JEE की परीक्षा में बैठी और उसने मेन्स में 92 प्रतिशत अंक प्राप्त किये तथा उसे बतौर अनुसूचित जाति श्रेणी में 2062 वां रैंक हासिल हुआ । उसके बाद वह जेईई एडवांस की परीक्षा में शामिल हुई जिसमें वह 15 अक्टूबर 2021 को सफल घोषित की गयी और उसकी रैंक 1469 आयी।

इसके पश्चात आईआईटी बीएचयू में उसे गणित एवं कम्पयूटर से जुड़े पंच वर्षीय कोर्स में सीट आवंटित की गयी। किन्तु वह दाखिले की लिए जरूरी 15 हजार की व्यवस्था नही कर सकी और समय निकल गया। वह दाखिला नहीं ले पायी। उसने याचिका दाखिल कर मांग की थी कि उसे फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय दे दिया जाये।

उसने याचिका में कहा कि उसके पिता की किडनी खराब हैं और उसका प्रत्यारोपण होना है। अभी उनका हफ्ते में दो बार डायलेसिस होता है। ऐसे में पिता की बीमारी एवं कोविड की मार के कारण उसके परिवार की आर्थिक हालत बुरी होने के कारण वह समय पर फीस नही जमा कर पायी, जबकि वह प्रारम्भ से ही एक मेधावी छात्रा रही है।

जाने याचिका में क्या कहा गया

याचिका में कहा गया कि उसने ज्वांइट सीट एलोकेशन अथारिटी को कई बार पत्र लिखा कि उसे थोड़ा और समय दे दिया जाये किन्तु उसके पत्र का उसे कोई जवाब नहीं दिया गया। ऐसे में वह अदालत की शरण में आयी है।

यह देखकर कि छात्रा प्रारम्भ से ही मेधावी है और यदि उसे राहत न दी गयी तो उसे बहुत क्षति उठानी पड़ेगी, अदालत ने न केवल संबधित संस्थान को उसे दाखिला देने का आदेश दिया अपितु स्वयं ही अपनी जेब से उक्त छात्रा को 15 हजार रूपये दिये ताकि उसकी पढ़ायी में कोई विघ्न न होने पाये।

अदालत ने बीएचयू को भी निर्देश दिया कि जब कोई नियमित सीट खाली हो जाये तेा उस पर उसका समायेाजन कर लिया जाये अन्यथा उसे अलग से ही सीट बढ़ाकर उसकी पढ़ायी चालू रखी जाये। अदालत ने मामले को अगली सुनवायी के लिए अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का आदेश रजिस्ट्री को दिया है।

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