गोरखपुर के फेमस ‘तिवारी के हाते’ से 2022 विस. चुनाव को लेकर क्या है सियासी संदेश ! पढ़िए ये खबर

पूर्वांचल की राजनीति में हरिशंकर तिवारी का आज भी दबदबा बरकरार है

गोरखपुर.पूर्वांचल की सियासत में ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी का परिवार बसपा की हाथी से उतरकर अब सपा की साइकिल की सवारी करने की तैयारी में है. जी हां आप सही समझ रहे है. कुछ ऐसे ही सियासी समीकरण दिख रहे है. बता दें पूर्वांचल की राजनीति में बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी का दबदबा कई विधानसभा सीटों पर देखा जा सकता है. हरिशंकर तिवारी अब बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं. सादा धोती-कुर्ता, सदरी और सिर पर ऊनी टोपी पहनने वाले तिवारी को देखकर कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता है कि पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्रीशीटर रहे और उन पर कई संगीन मामले दर्ज थे. साल 2012 में मिली हार के बाद से हरिशंकर तिवारी ने चुनाव नहीं लड़ा. वर्तमान में उनकी उम्र 85 वर्ष हो चुकी है. लेकिन आज भी गोरखपुर के चिल्लूपार में उनका प्रभाव है.बता दें कि गोरखपुर जिले के दक्षिणी छोर पर चिल्लूपार विधानसभा सीट से लगातार 6 बार विधायक रहे हरिशंकर तिवारी की पहचान ब्राह्मणों के बाहुबली नेता के तौर पर है. 70 के दशक में राजनीति में धनबल और बाहुबल के जनक के तौर पर स्थापित हरिशंकर तिवारी की तूती बोलती थी. एक समय था जब गोरखपुर शहर के बीचोबीच ‘तिवारी का हाता’ से ही प्रदेश की सियासत तय होती थी. कांग्रेस, बीजेपी, एसपी, बीएसपी…सरकार चाहे किसी की भी रही हो, हरिशंकर तिवारी सबमें मंत्री रहे. 1985 में हरिशंकर चिल्लूपार से विधायक बने. इसके बाद यह सीट तिवारी के नाम से जानी जाने लगी. वह 1989, 91, 93, 96 और 2002 में यहीं से जीते.

राजनीतिक और आपराधिक प्रभाव

गोरखपुर और आसपास के क्षेत्र में हरिशंकर तिवारी का सामाजिक, राजनीतिक और आपराधिक प्रभाव 70 के दशक में सबसे पहले देखा गया और अगले कुछ सालों में वे जातीय आधार पर अपने समुदाय के सबसे मजबूत बाहुबली नेता के रूप मे उभरे. उस समय पूर्वांचल के जातीय समीकरणों में उनके सामने अन्य जातियों के नेता भी टिक नहीं पाते थे.

परिवार की अगली पीढ़ी ने बढ़ाया सियासी सफर

हरिशंकर तिवारी पर उम्र का असर हावी हो गया है लेकिन परिवार की अगली पीढ़ी राजनीति में जम चुकी है. बड़े बेटे भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी संतकबीरनगर से सांसद रह चुके हैं. दूसरे बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार सीट से विधायक हैं. वहीं हरिशंकर तिवारी के भांजे गणेश शंकर पांडेय यूपी विधान परिषद के पूर्व सभापति रह चुके हैं.

समझिए पूर्वांचल का गणित

पूर्वांचल में कुल 24 जिले है, जिनमें 147 विधानसभा सीटें हैं. यानी यूपी विधानसभा की करीब 33 फीसदी सीटें अकेले पूर्वांचल से आती हैं. 2017 में भाजपा को इस इलाके में 102 सीट मिली थीं. 2012 में अखिलेश यादव की सत्ता का रास्ता भी पूर्वांचल से होकर गुजरा था और 2007 में मायावती के सत्ता पर काबिज होने में पूर्वांचल की भूमिका अहम थी. लोकसभा की बात भी करें तो यूपी की 80 में से 26 लोकसभा सीटें भी अकेले पूर्वांचल से हैं.

 

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