पुण्यतिथि: दुनिया में कौन हमारा है, कश्ती भी है टूटी-फूटी और दूर किनारा है

मुंबई। आएगी, किसी को हमारी याद आएगी’……कवि तो कवि होता है, कविता ताम्रपत्र पर लिखे, पन्नों या दीवारों पर। गीतकार आनंद बख्शी के शब्दों से भला कौन नहीं जानता होगा। ‘दुनिया में कौन हमारा है, कश्ती भी है टूटी-फूटी और दूर किनारा है, माँझी न सही कोई मौज कभी साथ हमें ले जाएगी, किसी को हमारी याद आएगी…।’ अपने गानों से आनंद बख्शी ने केवल इंडस्ट्री को बल्कि मोहब्बत को भी एक नई पहचान दी। भला ऐसा कौन हो सकता है जो आनंद बख्शी को न जानता हो।

हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे लंबे समय तक चलने वाली ‘दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे’ में गाने लिखे। यहां तक कि मील का पत्थर मानी जाने वाली फिल्म ‘शोले’ की एक कव्वाली में गाने का भी मौका बख्शी को मिला, मगर वह कव्वाली फिल्म में शामिल नहीं की जा सकी। धुनों पर गीत लिखने में मास्टर माने जाने वाले आनंद बख्शी आज होते तो फिल्मजगत उनका 88वां जन्मदिन मना रहे होते।

आनंद बख्शी बचपन से ही फिल्मों में काम करके शोहरत की बुंलदियों तक पहुंचने का सपना देखा करते थे लेकिन लोगों के मजाक उड़ाने के डर से उन्होंने अपनी यह मंशा कभी जाहिर नहीं की थी। वह फिल्मी दुनिया में गायक के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे।

आनन्द बख्शी अपने सपने को पूरा करने के लिये 14 वर्ष की उम्र में ही घर से भागकर फिल्म नगरी मुंबई आ गए जहां उन्होंने रॉयल इंडियन नेवी में कैडेट के तौर पर दो वर्ष तक काम किया। किसी विवाद के कारण उन्हें वह नौकरी छोड़नी पड़ी।

इसके बाद 1947 से 1956 तक उन्होंने भारतीय सेना में भी नौकरी की। ‘जब जब फूल खिले’ प्रदर्शित हुयी तो उन्हें उनके गाने’ परदेसियों से न अंखियां मिलाना’,’ये समां, समां है ये प्यार का’,’एक था गुल और एक थी बुलबुल’ सुपरहिट रहे और गीतकार के रूप में उनकी पहचान बन गई। फिल्म ‘मिलन’ के गाने’ सावन का महीना पवन कर शोर’,’युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे’,’राम करे ऐसा हो जाये’ जैसे सदाबहार गानों के जरिये उन्होंने गीतकार के रूप में नयी ऊंचाइयों को छू लिया।

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