‘कर्ण’ को ‘कानपुर’ बताकर फंस गया रेलवे, खड़ा हो गया बड़ा विवाद

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कानपुर। नार्थ सेट्रल रेलवे ने एक बड़ी मुसीबत में आ गया है। ये आफत कर्ण की मूर्ति को लेकर आई है। दरअसल, बीते दिनों कानपुर सेंट्रल प्रशासन ने बीते दिनों ऐलान किया था कि स्टेशन के बाहर पार्क में महाभारत काल के दानवीर कर्ण की मूर्ति लगाई जाएगी। इसके साथ ये कहा जा रहा था कि कर्ण से ही कर्णपुर हुआ, जो बाद में कानपुर हो गया।

रेलवे

डीएवी कॉलेज के प्राचीन इतिहास विभाग ने यह तर्क खारिज कर दिया है

लेकिन डीएवी कॉलेज के प्राचीन इतिहास विभाग ने यह तर्क खारिज कर दिया है। इतिहासकारों का कहना है कि आखिर क्यों कर्ण को इतनी तवज्जो दी जा रही है, जब उनका कानपुर से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। बता दें प्रशासन ने कहा था कि स्टेशन के बाहर पार्क में कानपुर के महानायकों की मूर्तियां लगाई जाएंगी। इसमें महाभारत काल के दानवीर कर्ण की मूर्ति सबसे आगे होगी।

कर्ण ने द्रोणाचार्य से जहां शिक्षा ली वह जगह वर्तमान में गुरुग्राम है

इतिहासकार बताते हैं कि कर्ण ने द्रोणाचार्य से जहां शिक्षा ली वह जगह वर्तमान में गुरुग्राम है। बाद में उन्हें अंगदेश जिसे आज भागलपुर के नाम से जाना जाता है, वहां का राजा बनाया गया। ऐसे में कोई भी साहित्यिक या पुरातात्विक सुबूत कर्ण से कानपुर को नहीं जोड़ता। भैरोघाट पर 1419 का एक शिलालेख मिला था, जिसमें शहर का नाम कान्हपुर लिखा था।

क्या है पूरा मामला

कानपुर स्टेशन के बाहर सिटी साइड के एक पार्क में रेलवे ने कर्ण, तात्या टोपे, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, गणेश शंकर विद्यार्थी, मौलाना हसरत मोहानी और चंद्रशेखर आजाद जैसे विभूतियों की मूर्तियां लगाने का फैसला किया गया था। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि दानवीर कर्ण ने कानपुर को बसाया था। बाकी सभी कानपुर की महान विभूतियां हैं।

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