राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, रद्द की सभी 32 हस्तक्षेप याचिकाएं

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नई दिल्ली। देश के सबसे विवादित अयोध्या मंदिर-मस्जिद मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया है। आज इस मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने तीसरे पक्षों की सभी 32 हस्तक्षेप याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके बाद इस विवादित मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को करने का फैसला सुनाया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में सिर्फ मूल पक्षकारों की ही सुनवाई की जाएगी।

कोर्ट की नजर में ये सिर्फ एक प्रापर्टी से जुड़ा हुआ मामला है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अयोध्य मसला उनके लिए सिर्फ एक प्रापर्टी से जुड़ा हुआ विवाद है। जहां दो पक्षों ने उस भूमि पर अपना-अपना दावा किया है। कोर्ट के अनुसार उसके लिए आस्था जैसी कोई चीज मायने नहीं रखती है।
न्यायालय ने मालिकाना हक विवाद के इस मामले में हस्तक्षेप के लिए भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी की अर्जी अस्वीकार कर दी। कोर्ट ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में हस्तक्षेप के लिए सभी अंतरिम अर्जियां अस्वीकार कीं।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने तीनों हस्तक्षेप याचिकाओं को नामंजूर कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी से पूछा है कि उन्हेंर इस मामले में तीसरे पक्ष के रूप में शामिल होने की इजाजत आखिर क्यों दी जाए। वहीं स्वामी ने कोर्ट में कहा कि उनका मौलिक अधिकार किसी भी प्रोपर्टी के अधिकार से ज्यादा अहम है। मुस्लिम पक्ष के राजीव धवन ने कहा कि हस्तक्षेप याचिका दायर कर कोर्ट में पहली कतार में बैठने का ये मतलब नहीं कि उनको पहले सुना जाय।

इस पर स्वामी ने पलट कर जवाब दिया कि पहले ये लोग मेरे कुर्ते-पाजामे पर सवाल उठा चुके हैं और अब अगली कतार में बैठने पर प्रश्न कर रहे हैं।

कोर्ट ने शिया वक़्फ़ बोर्ड की अर्जी को फिलहाल लंबित रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कोई भी इस मामले में पक्षकारों पर समझौता करने का दबाव नहीं डाल सकता। कोर्ट ने यह बात तब कही जब एक हस्तक्षेप याचिकाकर्ता कि तरफ से कहा गया कि उसकी याचिका पर 10523 लोगों ने साइन किए हैं कि इस मामले में समझौता होना चाहिए।

राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद केस में करीब 9 हजार से ज्यादा पन्ने हैं जो हिन्दी, पाली, उर्दू, अरबी, पारसी, संस्कृत आदि सात भाषाओं हैं, इनका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। कोर्ट के आदेश पर अनुवाद का यह काम उत्तर प्रदेश सरकार ने किया है।

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