शरणार्थी संकट से यूरोप की एकता खतरे में 

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नई दिल्ली| द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे भीषण शरणार्थी संकट से गुजर रहे यूरोपीय संघ पर क्या टूटने का खतरा मंडराने लगा है? क्षेत्रीय सहयोग एवं समन्वय का अनूठा उदाहरण बनकर उभरा यूरोप क्या फिर से बंद दरवाजों, बाड़ लगी सीमाओं और बाहरी समाज के प्रति निष्ठुरता वाले पुराने दौर में लौटने की कगार पर है?

Refugees wait at the Macedonian-Greek border near the town of Gevgelija, on August 22, 2015. Some 2,000 mostly-Syrian refugees spent a rainy night stranded in no-man's land between Greece and Macedonia as hundreds more began arriving on August 22, on their way to western Europe. The refugees and migrants, who have been there since August 20 spent the night sleeping on the ground despite heavy rain and temperatures which fell sharply during the night. Army troops were deployed throughout the forested hills which line the 50-kilometre (30-mile) border, army spokesman colonel Mirce Gjorgoski told AFP, giving no further details.  ROBERT ATANASOVSKI/AFP/Getty Images

वास्तविकता यही है कि यदि लगातार गंभीर होती जा रही इस समस्या को समय रहते, आपसी समझदारी से और जड़ से नहीं सुलझाया गया तो पूरी दुनिया के सामने मिसाल बनकर उभरे यूरोपीय संघ पर यह संकट मंडरा रहा है। शरणार्थियों के प्रवेश ने वैश्विक मंदी से पहले से ही जूझ रहे यूरोपीय देशों, ग्रीस, तुर्की, जर्मनी, साइप्रस, इटली और स्पेन पर न सिर्फ आर्थिक संकट की स्थिति पैदा कर दी है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सामुदायिकता से संबंधित समस्याएं खड़ी हो गई हैं। सबसे बढ़कर लगातार आ रहे शरणार्थियों के बीच छिपकर आतंकवादियों के प्रवेश करने का खतरा है।

शरणार्थियों के आने से सिर्फ उन्हें शरण देने वाले देश ही प्रभावित नहीं हुए हैं, बल्कि मार्ग में पड़ने वाले देश जैसे तुर्की और लेबनान पर भी दबाव बढ़ा है। यूरोपीय आम जनमत के अनुसार, शरणार्थी संकट ने यूरोपीय संघ (ईयू) की एकता को खतरे में डाल दिया है, क्योंकि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच शरणार्थियों के पुनर्वास जैसे मुद्दों पर मतभेद की स्थिति बन गई है।

उदाहरण के लिए जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) के नॉर्थ राइने वेस्टफालिया के स्टेट चेयरमैन ने यहां तक कह डाला, “जरूरत हुई तो जर्मनी की सीमाओं की बलपूर्वक रक्षा की जाएगी।” वास्तव में जर्मनी सहित अनेक यूरोपीय देशों में शरणार्थियों के प्रति नरम रुख रखने वाले लोगों के प्रति आम नाराजगी की भावना बढ़ी है।

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जर्मनी के मेइसेन में सैक्सन कस्बे के स्थानीय नेता मार्टिन बाहरमान पर हाल ही में एक सभा के दौरान किसी ने पेन से हमला कर दिया, जो शरणार्थियों के प्रति उनके गुस्से को जाहिर करता है। विश्लेषकों ने भी आशंका जताई है कि यदि यूरोप में शरणार्थियों को शरण देने की प्रक्रिया, शरणार्थियों का बंटवारा और सामूहिक शरणार्थी शिविरों की स्थापना जैसे मुद्दों पर सर्वसम्मति नहीं बनती तो यूरोपीय संघ फिर से उसी दशकों पुराने युग में चला जाएगा, जब विभिन्न देशों के बीच अनेक बाधाएं हुआ करती थीं, जैसे दो देशों के बीच बाड़ लगाया जाना या दीवारें खड़ी कर देना।

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि शरणार्थी समस्या का समाधान उचित तरीके से नहीं खोजा जाएगा तो शेंगेन क्षेत्र पर संकट खड़ा हो जाएगा। गौरतलब है कि शेंगेन समझौते के बाद इस इलाके में वीजा जैसी बाधाओं को खत्म कर दिया गया था। नवंबर की शुरुआत में 160,000 शरणार्थियों को सदस्य देशों के बीच बांटे जाने के विवादित मुद्दे पर हुई यूरोपीय संघ की बैठक से ठीक पहले लक्जमबर्ग के विदेश मंत्री ज्यां एसेलबोर्न ने ‘यूरोप में बेहद जटिल स्थिति बनने’ के प्रति चेतावनी दी थी और कहा था कि शरणार्थी संकट पर यूरोप फिर से बंट सकता है।

बहुत कुछ कहते हैं ये आंकड़े

अंतर्राष्ट्रीय आव्रजन संगठन (आईओएम) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, एक जनवरी, 2015 से नौ दिसंबर, 2015 के बीच सिर्फ समुद्र के रास्ते 924,147 शरणार्थी यूरोप में शरण लेने पहुंचे और इस बीच 3,671 शरणार्थियों की भूमध्य सागर में डूबने से मौत हो गई। शरणार्थियों के साइप्रस, ग्रीस, इटली, स्पेन, जर्मनी प्रमुख शरण स्थल रहे।

अकेले ग्रीस ने 771,508 शरणार्थियों को शरण दी, जो 2014 के मुकाबले 21 गुना अधिक रहा। इनमें से सर्वाधिक शरणार्थी सीरिया (388,130) के रहे, जबकि अफगानिस्तान से 142,301 और इराक से 44,349 शरणार्थियों ने ग्रीस में शरण ली।

इसी अवधि में जर्मनी ने करीब 965,000 शरणार्थियों को शरण दी, जिसमें आधे से अधिक सीरिया से थे। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) कार्यालय ने सितंबर में कहा था कि अगले दो वर्ष में भूमध्य सागर से होते हुए 850,000 शरणार्थियों के यूरोप पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें 2015 में यह संख्या जहां चार लाख के करीब होगी वहीं 2016 में यह संख्या बढ़कर 4.5 लाख हो जाने की उम्मीद है।

शरण देने वाले देशों के अलावा शरणार्थियों के मार्ग में पड़ने वाले देशों को भी काफी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं। जैसे तुर्की को सुरक्षा से लेकर आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है। इसके अलावा स्थानीय निवासियों ने इसके कारण अपराध में बढ़ोतरी, आम उपयोग की वस्तुओं की कीमत में उछाल और सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने वाली संस्थानों पर अतिरिक्त बोझ जैसी समस्याओं की शिकायतें की हैं।

लेबनान के विदेश मंत्री गेब्रान बासिल ने अक्टूबर में ही चेताया था कि सीरिया से आ रहे अत्यधिक संख्या में शरणार्थियों के कारण ‘अस्तित्व के संकट’ की समस्या खड़ी हो सकती है, जबकि लेबनान पहले से ही आंतरिक राजनीतिक संकट से जूझ रहा है।

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