याद किये गये भोजपुरी के अमर गीतकार महेन्दर मिसिर

लखनऊ: ‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हो ए ननदी दिअना जरा द’ जैसे गीतों के रचयिता और भोजपुरी के अमर गीतकार स्वर्गीय महेन्दर मिसिर की पुण्यतिथि पर अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास द्वारा उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सोमवार को अलीगंज के सेक्टर पी स्थित न्यास के शिविर कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में उनके लोक अवदान पर चर्चा भी हुई।

अध्यक्ष परमानंद का बयान

न्यास के अध्यक्ष परमानंद पांडेय ने कहा कि अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलाने में महेन्दर मिसिर का अहम योगदान है। वे चोरी-छिपे नोट छापकर भारत की आजादी के लिए संघर्षरत क्रांतिकारियों को आर्थिक सहयोग करते थे। इसी आरोप में छह अप्रैल 1924 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के वक्त पंडित जी ने एक गाना गाया- ‘पाकल-पाकल पनवा खियवले रे गोपीचनवा, पिरितिया लगाके भेजवले जेलखानवा’ जिसे खूब प्रसिद्धि मिली।

उपाध्यक्ष डी.पी.दुबे का बयान

न्यास के उपाध्यक्ष एवं समाजसेवी डी. पी. दुबे ने कहा कि महेन्दर मिसिर के लिखे गीतों को गाकर तवायफें स्वतंत्रता आंदोलन में मदद करती थीं। वे शोषित महिलाओं के दर्द को गीतों से उभारते थे। अनेक भोजपुरी कलाकारों ने उनके लिखे गीत गाकर प्रसिद्धि प्राप्त की और आज भी वे गीत उतने ही लोकप्रिय व प्रासंगिक हैं।

संयुक्त सचिव राधेश्याम पांडेय ने कहा कि महेन्दर मिसिर अपने गीतों में अपने नाम का उल्लेख जरूर करते थे। उनका एक गीत ‘नोटवा जे छापी गिनियां भजवल हो महेन्दर मसिर, ब्रिटिश के कइल हलकान हो महेन्दर मिसिर’ बड़ा प्रसिद्ध है। कार्यक्रम का संचालन न्यास के महासचिव एस.के.गोपाल ने किया। मौके पर प्रसून पांडेय, शाश्वत पाठक, अखिलेश द्विवेदी, दशरथ महतो, सुधा द्विवेदी आदि मौजूद रहे।

गीतों से गुलजार होती थी महफ़िल

पंडित महेन्दर मिसिर का जन्म सारण जिला के जलालपुर प्रखंड के मिश्रवलिया गांव में 16 मार्च 1886 को हुआ था। कलकत्ता, बनारस, मुजफ्फरपुर आदि जगह की कई तवायफें उनको अपना गुरु मानती थीं। इनके लिखे कई गीतों को उनके कोठों पर सजी महफिलों में गाया जाता था। पुरबी की परंपरा को महेन्दर मिसिर ने शिखर तक पहुंचाया। छब्बीस अक्टूबर 1946 को ढेलाबाई के कोठा स्थित शिवमन्दिर पर उन्होंने अन्तिम सांस ली।

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