अमीर देश जलवायु परिवर्तन से निपटने को कम, सीमाओं के शस्रीकरण को दे रहे हैं ज्यादा तरजीह

लखनऊ: एक ताज़ा शोध में पाया गया है कि दुनिया के कुछ सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश जलवायु परिवर्तन से निपटने में उतना नहीं खर्च करते जितना अपनी सीमाओं के सशक्तिकरण पर खर्च करते हैं।

COP 26 से पहले, अनुसंधान और एडवोकेसी थिंकटैंक ट्रांसनेशनल इंस्टीट्यूट (TNI) ने बॉर्डर हिंसा और जलवायु परिवर्तन के बीच की कड़ी पर नया शोध जारी किया है, जो हथियार और बॉर्डर सुरक्षा फर्मों को “जलवायु आपातकाल के मुनाफाखोर” के रूप में दर्शाता है।

TNI की रिपोर्ट, द ग्लोबल क्लाइमेट वॉल, को COP प्रतिनिधियों के लिए एक वेक-अप कॉल के रूप में लॉन्च किया जा रहा है। यह बताती है कि सबसे बड़े प्रदूषक सीधे जलवायु प्रभावों से निपटने के बजाय जलवायु-विस्थापित लोगों के खिलाफ सीमाओं के शस्रीकरण को प्राथमिकता दे रहे हैं।

रिपोर्ट में पता किया गया है कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सर्जक जलवायु वित्त की तुलना में सीमाओं के शस्रीकरण पर औसतन 2.3 गुना अधिक खर्च कर रहे हैं, और सबसे निकृष्टतम अपराधियों के लिए औसतन,15 गुना अधिक खर्च कर रहे हैं। इस “ग्लोबल क्लाइमेट वॉल” का उद्देश्य विस्थापन के कारणों को संबोधित करने के बजाय शक्तिशाली देशों को प्रवासियों के लिए बंद करना है।

रिपोर्ट दर्शाती है कि ग्लोबल क्लाइमेट वॉल जलवायु परिवर्तन से निपटने में विफल रहते हुए सीमाओं पर होने वाली मौतों और चोटों को त्वरित करेगी। जलवायु से जुड़े प्रवास के लिए सीमाओं का शस्रीकरण एक अव्यावहारिक समाधान है, और मानव पीड़ा को बढ़ाते हुए निवेश को जलवायु कार्रवाई से दूर ले जाता है। जलवायु संबंधी आपदाओं से विस्थापित लोगों की संख्या पहले से ही बढ़ रही है।

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