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Sant Ravidas Jayanti: संत रविदास जयंती पर PM मोदी ने किया सादर नमन, जूते बनाने से लेकर जानिए उनके जीवन की रोचक बातें

संत रविदास की जयंती 27 फरवरी को शनिवार के दिन मनाई जा रही है। सतगुरु रविदास जी भारत के उन विशेष महापुरुषों में से एक हैं, PM मोदी और मुख्यमंत्री योगी ने किया सादर नमन

लखनऊ: संत रविदास जयंती (Sant Ravidas Jayanti) पूर्णिमा पंचांग के अनुसार मास की 15वीं और शुक्लपक्ष की अंतिम तिथि को मनाई जाती है। इस साल संत रविदास की जयंती 27 फरवरी को शनिवार के दिन मनाई जा रही है। सतगुरु रविदास जी भारत के उन विशेष महापुरुषों में से एक हैं जिन्होंने अपने आध्यात्मिक वचनों से सारे संसार को एकता, भाईचारा पर जोर दिया।

रविदास जी की अनूप महिमा को देख कई राजा और रानियां इनकी शरण में आकर भक्ति के मार्ग से जुड़े। जीवन भर समाज में फैली कुरीति जैसे जात-पात के अंत (अन्त) के लिए काम किया।

PM मोदी का सादर नमन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि संत रविदास जी ने सदियों पहले समानता, सद्भावना और करुणा पर जो संदेश दिए, वे देशवासियों को युगों-युगों तक प्रेरित करने वाले हैं। उनकी जयंती पर उन्हें मेरा सादर नमन।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास की जयंती पर लखनऊ में उन्हें पुष्पांजलि दी।

रविदास जी पत्नी

रविदास जी के सेवक इनको ‘सतगुरु’, ‘जगतगुरू’ आदि नामों से सत्कार करते हैं। रविदास जी की दया दृष्टि से करोड़ों लोगों का उद्धार किया जैसे: मीरा बाई , जीजाबाई आदि। उनकी पत्नी लोना एक विदुशी महिला थीं। वो एक वैद्य भी थी।

जूते बनाने का काम

गुरू रविदास का एक नाम रैदास भी है। इनका जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1433 को हुआ था। उनके जन्म के बारे में एक दोहा प्रचलित है। चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास। उनके पिता रग्घु तथा माता का नाम घुरविनिया था। उनकी पत्नी का नाम लोना बताया जाता है। रविदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। वे जूते बनाने का काम किया करते थे और ये उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।

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साधु-सन्तों की सहायता

संत रामानन्द के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था।

साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रविदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।

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