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नारी के जीवन का उजाला हैं सावित्री बाई फुले(Savitribai Phule),पढ़ें उनकी रोचक कहानी

भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका जिनपर ऊंची जाति के लोग फेंकते थे गोबर।।।।

लखनऊ: आज उस महिला का जन्मदिवस है जिसके बारे में लिखना भी हमारे लिए फक्र की बात है। सिर गर्व से ऊंचा उठ जाता है जब हम इनके बारे में सुनते या बोलते हैं। क्योंकि बचपन में जब उसके हाथ में झाड़ू पकड़ा दी जाती थी तो वो दूसरे हाथ में किताब पकड़ कर चलती थी। रात के अंधेरे में जब देश सो रहा होता था तो वो दुनिया से छिपते-छिपाते लड़कियों को शिक्षा बांट रही थी। जब भी नारीवाद की बात चलेगी तो सबसे पहले सावित्री भाई फूले का ही नाम लिया जाएगा। जी हां, आज सावित्री भाई फूले (Savitribai Phule) की 191वीं जयंती मनाई जा रही है। इन्होंने न सिर्फ शिक्षा का महात्व समझा बल्कि महिलाओं को उनकी ताकत का एहसास भी करवाया। उन्हें बताया कि नारी होने का मतलब सिर्फ घर और बच्चे संभालना ही नहीं है, बल्कि वो कुछ भी कर सकती हैं। वो सावित्री बाई हीं थी जिन्होंने बड़े ही साहस और उत्साह के साथ स्त्री शिक्षा को आगे बढ़ाया।

नारी के जीवन का उजाला हैं सावित्री बाई फुले, पढ़ें उनकी रोचक कहानी
सावित्रीबाई फुले

हम आपको बताएंगे सावित्री बाई फूले के कुछ ऐसे रोचक किस्से जिनको पढ़ने के बाद आपको उन पर गर्व होगा।

8 साल की उम्र में हुई सावित्री बाई की शादी

सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायगांव में हुआ था। सावित्री बचपन से ही पढ़ाई में रूची लेती थी। लेकिन उस दौरान पढ़ाई को महात्व नहीं दिया जाता था, खासतौर पर महिलाओं की शिक्षा पर। बस 9 साल के होते ही मां-बाप को बच्चों की शादी की चिंता सताने लगती । सावित्री बाई को भी 9 साल की उम्र में ही शादी के बंधन में बंधना पड़ा। सावित्री बाई के पति ज्योतिबा भी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने भी सिर्फ तीसरी कक्षा तक की ही शिक्षा प्राप्त की थी।

सावित्री बाई को मिला पति का साथ

लेकिन फुले को शिक्षा का महात्व काफी अच्छे से पता था। समाज की बातों को दर किनार करके उन्होंने सावित्री की इच्छाओं का सम्मान किया और उन्हें पढ़ाया। सावित्री ने भी बिना देरी किए तीसरी कक्षा तक का सारा ज्ञान अपने पति से प्राप्त किया।

सावित्री बाई ने खोला स्कूल

लेकिन सावित्री बाई यहीं नहीं रूकना चाहती थी वो और भी पढ़ना –लिखना चाहती थी और आगे बढ़ना चाहती थी। इसीलिए उन्होंने अपने ही घर में स्कूल खोल लिया। यह पहला ऐसा विद्यालय था जहां स्त्री शिक्षा को महात्व दी गई।

दुनिया से छिपते-छिपाते दी शिक्षा

ऐसे करते – करते सावित्री बाई ने करीब 10 और स्कूल खोल लिए। लेकिन वो यहीं नहीं रुकी, जब देखा कि लड़कियों को शिक्षा देना आसान नहीं था क्योंकि लोग लड़कियों को पढ़ने के लिए नहीं भेजते थे। तो सावित्री बाई रात के अंधेरे में छिप-छिपाकर लड़कियों को घर से लाकर पढ़ाती और फिर सुबह होने से पहले ही उन्हें उनके घर तक छोड़ कर भी आती। सावित्री बाई का कहना था कि ये रात का अंधेरा तो सुबह होते ही छट जाएगा लेकिन अगर इन लड़कियों को शिक्षा नहीं मिली तो इनकी जिंदगी का अंधेरा कभी नहीं छट पाएगा।

गोबर से किया हमला

सावित्री बाई के लिए यह सब कर पाना बिलकुल भी आसान नहीं था। सावित्री अपने साथ दो साड़ियां रखती थी क्योंकि जब वो स्कूल जाती तो ऊंचे जाति के लोग उन पर गोबर फेंकते जिससे उनकी साड़ी खराब हो जाती। लेकिन सावित्री हमला करने वालों को जवाब देने से बेहतर स्कूल पहुंचकर साड़ी बदल कर पढ़ाना सही समझती थी।

सावित्री का मानना था कि इस धरती पर ब्राह्मणों ने खुद को स्वघोषित देवता बना लिया है। वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती हैं।

प्रतिबंधक गृह की स्थापना

धीरे-धीरे सावित्री बाई की हिम्मत और बढ़ती गईं और उन्होंने महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार का भी विरोध करना शुरू कर दिया।  फुले दम्पत्ति ने 28 जनवरी 1853 में अपने पड़ोसी मित्र और आंदोलन के साथी उस्मान शेख के घर में बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। जिसकी जिम्मेदारी सावित्रीबाई ने ली। ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’  उन महिलाओं के लिए आश्रय स्थल था जो गर्भवती थी। उन्होंने विधवा महिलाओं के बाल काटने का भी विरोध किया। नाइयों की हड़ताल करवाई  और उन्हें विधवा केशवापन ना करने के लिए प्रेरित किया।

सावित्रीबाई फुले ने लिखी दो पुस्तकें

सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकें भी लिखीं थी । पहला कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ 1854 में छपा, तब सावित्री बाई की उम्र मात्र 23 साल थी। दूसरी किताब ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1991 में आई , जिसमें सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी के रूप में लिखा था।

पढ़िए भारत की पहली शिक्षक के कुछ प्रेरित विचार

  • जाओ शिक्षा प्राप्त करो, आत्मनिर्भर बनो, मेहनती बनो काम करो- ज्ञान और धन इक्कट्ठा करो, बिना ज्ञान के सब खो जाता है।
  • हमारी जानी दुश्मन का नाम है अज्ञान, उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो और उसे जीवन से भगा दो।
  • शूद्रों का दर्द, दो हज़ार वर्ष से भी पुराना है, ब्राह्मणों के षड्यंत्रों के जाल में, फंसी रही उनकी ‘सेवा’
  • उठो, अरे अतिशूद्र तुम, यह गुलामी की परंपरा की, मनुवादी पेशवा मर-मिट चुके,खबरदार मत लेना, मनु विद्या तुम.

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