वैज्ञानिकों ने दी चेतावानी- उत्तराखंड में फिर आ सकती है केदारनाथ जैसी त्रासदी

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देहरदून। उत्तराखंड में समय-समय पर प्राकृतिक आपदाएं दस्तक देती रहती है। प्रदेश बड़ी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं की शांति से जूझ रहा है। परन्तु दुखद बात तो ये है कि केदारनाथ जैसी त्रासदी झेलने के बे बाद भी उत्तराखंड की सरकारें सबक लेने को तैयार नहीं है। वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट को या तो दरकिनार किया जा रहा है अथवा सवालों के साथ वापस भेजा जा रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से संवेदनशील राज्य में यह अनदेखी भारी पड़ सकती है।

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प्रसिद्ध पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि इस साल बारिश और बर्फबारी न होने से ग्लेशियरों पर संकट मंडरा रहा है। तापमान बढऩे के साथ ही ग्लेशियरों पर जमा पुरानी बर्फ पिघलने लगेगी। इससे भविष्य में जल संकट और गहराएगा। उन्होंने कहा कि इस बदलाव का असर हिमालय के साथ ही समुद्री तटीय इलाकों पर भी पड़ेगा।

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) के सेमिनार में इस बात का जिक्र किया कि हमने कई बार केदारनाथ की सुरक्षा को लेकर बिंदुवार रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजा, लेकिन विडम्बना यह कि रिपोर्ट सवालों के साथ लौटा दी गई। आपको बता दे कि केदारनाथ में हुई आपदा के बाद यूसैक की टीम ने केदारनाथ के आसपास के क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया था और सरकार को रिपोर्ट भी भेजी थी। रिपोर्ट में यूसैक ने इस एरिया को डेंजर जोन घोषित किया था।

वैज्ञानिकों की रिपोर्ट की अनदेखी का नतीजा यह रहा कि पिथौरागढ के मालपा, रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ और उत्तरकाशी के वरुणावत में आई आपदाओं में व्यापक पैमाने पर नुकसान हुआ। सेमिनार में मेगसेसे और गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि आपदा रोकना मुमकिन नहीं है, लेकिन इससे होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब ऐसी रिपोर्टों की अनदेखी नहीं की जाएगी। सेमिनार में उपस्थित उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने वैज्ञानिक रिपोर्ट की अनदेखी गंभीर मसला है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ऐसी रिपोर्टों का सरकार संज्ञान लेगी।

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