वैज्ञानिकों ने बताई हिमालय में आने वाली तबाही की वजह, आप भी जानें

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श्रीनगर (पौड़ी)। उच्च हिमालयी क्षेत्र अतीत में ग्लेशियरों से निकले मलबे से विकसित हुआ है। ऐसे क्षेत्र को ‘हिमोढ़’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन क्षेत्रों में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण बड़ी तबाही को न्यौता देना है। इस हिमोढ़ में उत्तराखंड के अलावा हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश के अलावा नेपाल का बड़ा इलाका भी आता है । वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी सभी को सचेत होने का संकेत भी दे चुकी है।

भौतिकी शोध प्रयोगशाला (पीआरएल) अहमदाबाद के वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र ग्लेशियरों से निकले मलबे पर बसा है। ऐसी भूमि ज्यादा भार और पानी का दबाव सहन नहीं कर सकती है। यहां भूतल अस्थिर है।

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वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत अध्ययन और जांच जरूरी

साथ ही झील के स्तर में उतार-चढ़ाव से भूधंसाव का खतरा भी रहता है, ऐसी स्थिति में बड़ी बांध परियोजनाएं पूरे क्षेत्र के लिये बड़ा खतरा बन सकती हैं। उत्तराखंड का दो तिहाई हिस्सा उच्च हिमालयी क्षेत्र के तहत आता है। सरकार इसी क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं बनाने की तैयारी में है। आज उत्तराखंड के ऐसे क्षेत्र में करीब 27 छोटी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।

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डॉ. जुयाल के मुताबिक ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए छोटी जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। हालांकि उससे पहले जल, जंगल, जमीन और जीवों का वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत अध्ययन और जांच की जानी चाहिए। डॉ. जुयाल कहते हैं कि नदियों के प्राकृतिक स्वरूप, गति और हिमोढ़ पर अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित की जाए। साथ ही एक बांध से दूसरे बांध के बीच की दूरी भी निर्धारित की जानी चाहिए।

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मानकों के पालन के लिए गठित हो कमेटी

जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान मानकों की निगरानी होनी बहुत जरूरी है। डॉ. जुयाल ने बताया कि जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन निर्माणदायी संस्था मानकों का पालन कर रही है या नहीं, इसके लिए कोई निगरानी कमेटी नहीं है। जरूरत इस बात है कि ऐसे सभी निर्माणों पर नजर रखने के लिये एक कमेटी गठित की जाय।

साभार – अमर उजाला

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