देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने तय किया लोकायुक्‍त

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लखनऊ। दिन वही, तारीख भी वही। और तो और सरकार भी वही। लेकिन लोकायुक्‍त की नियुक्ति नहीं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यूपी में लोकायुक्‍त की नियुक्ति‍ न होने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने विशेषाधिकार का इस्‍तेमाल किया।

यह पहला मौका था जब‍ सुप्रीम कोर्ट को किसी राज्‍य में लोकायुक्‍त की नियुक्ति मामले में इस तरह दखल देना पड़ा हो। आखिर कोर्ट ने जस्‍टिस वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्‍त तय कर दिया।

यह पहला मौका नहीं जब यूपी के लाेकायुक्‍त पर विवाद खड़ा हुआ हो। चार बार खुद यूपी के राज्‍यपाल ने नए लोकायुक्‍त के प्रस्‍ताव को वापस किया। तर्क दिया कि कानूनी नजरिए से नए लोकायुक्‍त की नियुक्ति के लिए किए गए लोकायुक्‍त चयन संशोधन ठीक नहीं है।


कौन हैं नए लोकायुक्‍त

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यूपी के नए लोकायुक्‍त जस्टिस वीरेंद्र सिंह का नाम बहुत गोपनीय रखा गया था।जस्टिस वीरेंद्र सिंह 2009 से 2011 तक हाइकोर्ट के जज रहे थे। 1977 बैच के pcs j वीरेंद्र सिंह यूपी में मेरठ के रहने वाले है। जस्टिस वीरेंद्र सिंह के कई फैसलों की नजीर भी दी जाती है।


जानिए कैसे खड़ा हुआ पूरा विवाद

1- राज्य सरकार ने 27 अगस्‍त को फैसला लिया कि अब लोकायुक्त के चयन में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कोई भूमिका ही नहीं होगी। लोकायुक्त के चयन के लिए मनमाफिक नियुक्ति का रास्ता साफ करने के लिए राज्य सरकार ने यह कदम उठाया। विधानसभा में लोकायुक्त चयन संशोधन विधेयक भी पारित कर दिया गया।

2- बदले हुए नियमों में लोकायुक्त का चयन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय समिति को करना था। इसमें विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा में नेता विपक्ष तथा समिति के अध्यक्ष द्वारा विधानसभा के परामर्श से नामित सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बतौर सदस्य शामिल होने थे।

3- यह भी तय किया गया कि चयन समिति में शामिल सदस्यों में से कोई पद रिक्त होने पर भी लोकायुक्त की नियुक्ति को अवैध नहीं माना जाएगा। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बीच सरकार ने इन प्रावधानों के साथ विधानमंडल के दोनों सदनों में उप्र लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त (संशोधन) विधेयक-2015 पारित करा लिया।

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4- सरकार के इस कदम से लोकायुक्त का मामला एक बार फिर राजभवन के पाले में पहुंच गया है। नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार और राजभवन के बीच जिस तरह टकराव की स्थिति पैदा हो गई।

5- इससे पहले राज्यपाल ने यूपी सरकार द्वारा चौथी बार भेजे गए लोकायुक्त का नाम खारिज करते हुए सरकार से नया नाम सुझाने को कहा था। राज्यपाल ने पूर्व न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह को लोकायुक्त बनाने के विचार को खारिज करते हुए सरकार से नया नाम मांगा था। अपने लिखित जवाब में राज्यपाल ने यह भी स्पष्ट किया है कि किन वजहों से रवींद्र सिंह की नियुक्ति लोकायुक्त पद पर नहीं हो सकती।

6- राज्यपाल ने अपनी आपत्तियों में कहा है कि चयन समिति के सदस्यों के बीच विचार-विमर्श कर लोकायुक्त का नाम आम सहमति से तय करने की कानूनी औपचारिकता पूरी नहीं की गई। नियमत: मुख्यमंत्री, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष को बैठक कर नाम तय करना चाहिए। इसके बाद ही नियुक्ति के लिए सिफारिश भेजी जानी चाहिए।

7- सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 24 अप्रैल को कहा था कि लोकायुक्त जस्टिस मेहरोत्रा का कार्यकाल खत्म होने के 6 महीने के अंदर नए लोकायुक्त की नियुक्ति हो जानी चाहिए। सरकार इसमें असफल रही इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेषाधिकार का इस्‍तेमाल करने हुए जस्टिस वीरेंद्र सिंह को नया लोकायुक्‍त नियुक्‍त कर दिया।

क्या है लोकायुक्त?
लोकायुक्त (लोक + आयुक्त) भारत के राज्यों की ओर से गठित भ्रष्‍टाचार निवारण संस्‍था है। इसका गठन स्कैंडिनेवियन देशों में प्रचलित ‘अंबुड्समैन’ (Ombudsman) की तर्ज पर किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट को क्‍यों देना पड़ा दखल

16 मार्च, 2006 को यूपी के छठे लोकायुक्त के तौर पर जस्टिस एनके मेहरोत्रा संशोधन के बाद 15 मार्च 2014 को अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। संशोधित कानून के मुताबिक, नए लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने तक वह अपने पद पर बने हुए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल, 2014 को संशोधन पर रजामंदी की मुहर लगाते हुए ये भी कहा था कि लोकायुक्त जस्टिस मेहरोत्रा का कार्यकाल खत्म होने के 6 महीने के अंदर नए लोकायुक्त का अपॉइंटमेंट हो जाना चाहिए।

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