मीरा की लोक व्याप्ति विषयक संगोष्ठी में सात विभूतियां सम्मानित

प्रेम दीवानी और मध्यकालीन भक्ति साहित्य परम्परा की स्तम्भ मीराबाई की जयन्ती पर शुक्रवार को उन्हें याद किया गया। और उनके लोक अवदान पर विस्तृत चर्चा हुई।

लखनऊ: प्रेम दीवानी और मध्यकालीन भक्ति साहित्य परम्परा की स्तम्भ मीराबाई की जयन्ती पर शुक्रवार को उन्हें याद किया गया। और उनके लोक अवदान पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रेस क्लब में लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा आयोजित मीरा की लोक व्याप्ति विषयक संगोष्ठी में सात विभूतियों को सम्मानित भी किया गया। आयोजन में वरिष्ठ साहित्यकार दयानन्द पाण्डेय, कलाकुंज भारती के सम्पादक पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात’ ने विषय पर आधारभूत वक्तव्य दिया। अध्यक्षता लोक विदुषी डाॅ. विद्याविन्दु सिंह ने की। मुख्य अतिथि के रुप में लखनऊ विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित आनलाइन सहभागी हुए।

कार्यक्रम  में बोले सुधाकर अदीब

कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ कथाकार डाॅ. सुधाकर अदीब ने कहा कि सोलहवीं शताब्दी की विश्वविभूति सन्त मीरा नारी स्वातंत्र्य और उसकी अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाली एक विद्रोहिणी कवयित्री थीं। एक राजकुल में जन्म व दूसरे राजकुल में ब्याही स्त्री होकर भी वह सामंती व्यवस्थाओं और पुरुषवादी सत्ता को निर्भीकता से चुनौती देने वाली प्रथम सत्याग्रही थीं। उन्नीसवीं शताब्दी में आत्मस्वाभिमान की जो लड़ाई रानी लक्ष्मीबाई ने तलवार उठाकर लड़ी थी, उसे अपने एकतारे के बल पर मीराबाई तीन सौ बरस पहले ही लड़ चुकी थीं।

‘स्त्रियों को नई ऊँचाई दी’

साहित्यकार डाॅ. अमिता दुबे ने मीरा को अपाला और गार्गी की परम्परा का संवाहक बताते हुए कहा कि उन्होंने बदले हुए परिवेश में स्वतंत्रता को पुनरस्थापित किया। मीरा के गीतों ने स्त्रियों को नई ऊँचाई दी और वे स्त्री स्वातंत्र्य की प्रथम दीप्ति के रुप में सामने आयीं।

‘प्रेम की भाषा को ही प्राथमिकता दी

साहित्यकार डा. रामबहादुर मिश्र ने मीरा, तुलसी, कबीर और जायसी को मध्यकालीन ऐसे सन्त के रुप में याद किया जो प्रेम के गायक और प्रतिष्ठापक हैं। वैमनस्यपूर्ण परिवेश में आज भी वे उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि मीरा ने री मैं तो प्रेम दीवानी, तुलसी ने रामहिं केवल प्रेम पियारा, कबीर ने ढाई आखर प्रेम के और जायसी ने जेहिमा मारग प्रेम कर सबै सराहें ताहि के माध्यम से प्रेम की भाषा को ही प्राथमिकता दी।

‘उन्हें मरु मन्दाकिनी भी कहा जाता है’

मुख्य अतिथि प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में काम करते हुए मैं प्रतिवर्ष मीरा के जन्मस्थली जाता रहा। उनकी रचनायें मुख्यतः तीन विभाषाओं में मिलती है जिसमें तीन सौ पद गुजराती हैं और शेष पश्चिमी राजस्थानी और ब्रज भाषा के। इसी प्रकार रचनाओं के तीन पाठ भेद भी मिलते हैं री मैं तो प्रेम दीवाणी को ब्रजभाषा में हरि मैं तो प्रेम दीवानी तथा म्हा तो प्रेम दीवाणी राजस्थानी पाठ मिलते हैं। मीरा हिन्दी के गर्व गौरव की प्रतीक हैं ही उन्हें मरु मन्दाकिनी भी कहा जाता है।

‘विद्रोही स्वर के रुप में सामने आयीं’

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लोक विदुषी डाॅ. विद्याविन्दु सिंह ने कहा कि मीरा तद्युगीन सामन्ती व्यवस्था के भीतर विद्रोही स्वर के रुप में सामने आयीं। उनकी लोक व्याप्ति इतनी है कि लोक में जैसे देवी भवानी लोगों के सिर आती हैं, वैसे ही मीरा लोगों के सिर आती हैं। लोग उनसे वर मांगते हैं और वह फलित होता है।

भजन मेरो तो गिरधर गोपाल से हुई कार्यक्रम की शुरुआत

वरिष्ठ लोक गायिका आरती पाण्डेय ने मीरा के प्रिय भजन मेरो तो गिरधर गोपाल से कार्यक्रम की शुरुआत की। संस्कृतिकर्मी राजेन्द्र विश्वकर्मा ‘हरिहर’ के संचालन में हुए आयोजन में कृष्णप्रताप विद्याविन्दु लोकहित न्यास की उपाध्यक्ष एवं साहित्यकार डाॅ. करुणा पाण्डेय, नीलाक्षी लोक कला कल्याण समिति की अध्यक्ष नीलम वर्मा, लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी, वरिष्ठ गायिका पद्मा गिडवानी, आलोक दूबे, मंजू श्रीवास्तव, जादूगर सुरेश कुमार, विद्याभूषण सोनी, अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास के उपाध्यक्ष श्री डी. पी. दुबे, दिग्विजय मिश्र, राधेश्याम पांडेय, सुदर्शन दुबे, शशिकांत जी, दशरथ महतो, अखिलेश द्विवेदी, अखिलेश त्रिवेदी ‘शाश्वत’, गगन शर्मा, टी. टी. सुनील, महर्षि कपूर, सीमा अग्रवाल, सौरभ कमल, माधुरी, राजनारायण वर्मा, एस. के. गोपाल आदि मौजूद रहे। अन्त में डा.संगीता शुक्ला ने आभार ज्ञापित किया।

इनको मिला सम्मान:-

इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए सात विभूतियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में रंग राची उपन्यास के लिए मीराबाई लोक साहित्य सृजन सम्मान डाॅ. सुधाकर अदीब, अवधी के संरक्षण-संवर्द्धन में सुदीर्घ योगदान के लिए लोकभाषा भगीरथ सम्मान डाॅ. रामबहादुर मिश्र, कथा साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए साहित्य साधक सम्मान डाॅ. अमिता दुबे, भोजपुरी लोक संस्कृति संरक्षण-संवर्द्धन हेतु लोक संस्कृति उन्नायक सम्मान परमानंद पांडेय, नई पीढ़ी में मूल्यपरक सांस्कृतिक शिक्षा संचार में विशिष्ट योगदान के लिए मीराबाई संस्कृति शिक्षक सम्मान डाॅ. भारती सिंह, सांस्कृतिक उन्नयन में योगदान के लिए मीराबाई लोक संस्कृति रत्न सम्मान ज्योति किरण सिन्हा और लोकगीत संरक्षण-संवर्द्धन हेतु मीराबाई लोक संगीत युवा प्रतिभा सम्मान आदर्श मौर्य को प्रदान किया गया।

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