शायरों के लिए शायरी का कुछ अलग अंदाज, जिससे दुश्मन भी दोस्त बन जाये

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आज कल के दौर में तो हर तरफ शायर देखने को मिलते है। लेकिन शायरी में ये दम कम ही देखने को मिलता है। शायरों का ज़हीन दिल कभी किसी से लम्बे समय तक दुश्मनी नहीं रख सकता। इसलिए उन्होंने कई ऐसे अशआर कहे जिससे अगर दुश्मनी भी हो तो वह दोस्ती में बदल जाए। दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
– बशीर बद्र

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए
– निदा फ़ाज़ली

दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो क़दम
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे

– बशीर बद्र

करे है अदावत भी वो इस अदा से
लगे है कि जैसे मोहब्बत करे है
– कलीम आजिज़

दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त

दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से
– हफ़ीज़ होशियारपुरी

बरताव इस तरह का रहे हर किसी के साथ
ख़ुद को लिए दिए भी रहो दोस्ती के साथ
– अहमद वसी

फूल खुलते ही तितली भी आई

क्या कोई दोस्ती पुरानी है
– नादिर शाहजहाँ पुरी

न ग़ैर ही मुझे समझो न दोस्त ही समझो
मेरे लिए ये बहुत है कि आदमी समझो
– महशर इनायती

दोस्ती ख़्वाब है और ख़्वाब की ता’बीर भी है

रिश्ता-ए-इश्क़ भी है याद की ज़ंजीर भी है
– अज्ञात

बहारों की नज़र में फूल और काँटे बराबर हैं
मोहब्बत क्या करेंगे दोस्त दुश्मन देखने वाले
– कलीम आजिज़

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