….वो हो गई अब सोलह बरस की

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2016-new-year

इंटरनेट डेस्क। समय बदलते देर नहीं लगता। देखते-देखते सबकुछ बदल जाता है। सभी लोगों ने नए साल का बखूबी स्वागत किया। आज 21वीं सदी सोलह बरस की हो गई। उम्र की वो दहलीज जो बचपन और जवानी के बीच एक धुंधली लकीर का काम करती है।

बीती शताब्दी ने की दुआ
जब 21वीं का जन्म हुआ था, तो बूढ़ी हो चुकी गत सदी ने कहा था दुआ करती हूँ कि तुम्हारी किस्मत मुझसे अच्छी हो। मैंने दो-दो विश्व युद्ध देखे, कोल्ड वार देखा, परमाणु बमों को शहरों को सपाट करते देखा, मुल्कों का बंटवारा देखा, लाखों का कत्लेआम देखा, आपदा, भूख से मरते लोग देखे, वो दिन फिर से नहीं आएं यह मेरी दुआ है रब से। 21 वीं सदी अपने पोपले मुंह से किलकारियां मार रही थी।

बंदूक और वर्दी के साए में मना सोलहवां साल
उम्मीदों से भरी एक पूरी जिंदगी उसके सामने थी। लेकिन मुश्किल से 9 माह हुए थे, वो चलना सीख रही थी कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सीने पर गहरा वार हुआ। बुढिय़ा की दुआ कुबूल नहीं हुई। सौ साल से उसने जो गठरियां जमा की थीं, उनके बोझ और बदबू से 21वीं सदी बच नहीं सकी। उसका सोलहवां साल पूरी दुनिया मना रही है, लेकिन बंदूक और वर्दी के साए में।

बहुत कुछ झेला
पटाखे चल रहे हैं लेकिन बम और गोलियों की आवाज में दब से गए हैं। वो सोलह की हो गई है लेकिन न तो वो बेफ्रिक है, न ही वो इश्किया है। इस कमसिन उम्र में ही उसने इराक को जलते हुए देखा है, सीरिया को पिघलते देखा है, अफगानिस्तान को बदहाल होते देखा है, पाकिस्तान को बेहाल होते देखा है। मुंबई, लंदन, पेरिस सबको घायल होते देखा है।

इंसानों की तरक्कीब भी देखी
उसने इंसानों की तरक्की भी देखी है, देशों की खुशहाली भी देखी है लेकिन उन सब पर नफरत को भारी पड़ते देखा है। 21वीं सदी ने इन सोलह सालों में मजबह को सिर्फ एक दूसरे से डरने की, एक दूसरे को डराने की वजह बनते देखा है। लेकिन फिर भी खुशहाल जिंदगी जी रही है 21 वीं सदी।

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