supreme कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत पर जारी किया अहम फैसला

दिल्ली : :supreme कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संयुक्त पीठ ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा कि अग्रिम जमानत को एक समय सीमा तक सीमित नहीं किया जा सकता है जब तक कि अदालत किसी विशिष्ट मामले में ऐसी स्थिति का आदेश नहीं देती है। इस मसले पर आप की जानकारी के लिए बताते चलें कि कानूनी ज़बान में अग्रिम ज़मानत उस न्यायिक निर्देश को कहते हैं जिसमे व्यक्ति के गिरफ्तार होने से पहले ज़मानत जारी कर दी जाती है।

supreme कोर्ट ने गुरुबक्श और सलाहुद्दीन केस के मद्देनज़र सुनाया फैसला

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इस संयुक्त पीठ में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंद्रा बनर्जी, जस्टिस सरन, जस्टिस शाह और जस्टिस रविंद्र भट शामिल थे। पीठ ने भारत की दंड संहिता का हवाला देकर कहा की गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत का आदेश दिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों से संबंधित सीआरपीसी की प्रासंगिक धारा 438 को पढ़ने से अग्रिम जमानत के लिए एक निश्चित समय सीमा के बारे में कोई बात नहीं होती है। खबर के मुताबिक पीठ का गठन 1980 गुरबख्श सिंह सिब्बा और 1996 के सलाहुद्दीन अब्दुलसमाद केस के फसलों से आये विरोधाभास को दूर करने के लिए किया गया था।

फैसले के साथ supreme कोर्ट ने जारी किये नियम

इस मुद्दे पर आये फैसले के मुताबिक अग्रिम जमानत के आवेदन में उस अपराध से संबंधित अनिवार्य तथ्य के साथ साथ आवेदक का पक्ष भी शामिल होना चाहिए। इसी के साथ साथ उन्होंने यह भी कहा की अग्रिम ज़मानत के लिए पुलिस द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट का दर्ज होना ज़रूरी शर्त नहीं मानी जाएगी। इसी के साथ साथ पीठ ने कहा कि  पुलिस द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट का पंजीकरण अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने के लिए एक आवश्यक पूर्व शर्त नहीं है।

इस के साथ पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत के मामलों से निपटने वाले न्यायालयों को सीमित अंतरिम अग्रिम जमानत देने से पहले ही लोक अभियोजक की बात सुननी चाहिए और तथ्य प्राप्त करना चाहिए। इस मसले पर बात करते हुए पीठ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अग्रिम जमानत केवल उस अपराध के संबंध में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करती है जिसमें वह गिरफ्तारी की आशंका रखता है।

यह अपराधी को बचाने की अनुमति नहीं देती। इसी के साथ साथ पीठ ने यह भी कहा की पुलिस किसी ऐसे आरोपी की गिरफ्तारी की अनुमति मांगने के लिए अदालतों का रुख करने के लिए स्वतंत्र होगी, जिसे अदालत ने अग्रिम जमानत दी है। इस कड़ी में पीठ ने संविधान पीठ ने सिद्धराम सतलिंगप्पा मेहत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य सहित मामलों को खारिज कर दिया, जहां अदालत ने फैसला सुनाया कि अग्रिम जमानत आदेश में कोई प्रतिबंधात्मक शर्तें नहीं लगाई जा सकती हैं। इसने उन मामलों को भी उलट दिया जहां समय सीमा गलत तरीके से लगाई गई थी।

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