महिलाओं की ये ताक़त अब मीडिया भी पहचान रहा है

समय आया और महिलाओ ने ना सिर्फ़ अपने समुदाय के बल्कि सभी के अधिकारों के लिए सड़क की लड़ाई लड़ रही हैं

नई दिल्ली: बात शाहीनबाग़ की हो या फिर किसी कॉलेज यूनिवर्सिटी या किसान आंदोलन की आधुनिक समाज में जब पहली बार महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए घर से बाहर क़दम रखा होगा तब शायद ही किसी ने उम्मीद की होगी कि महिलाएं एक दिन बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरेंगी. लेकिन वो समय आया और महिलाएं ना सिर्फ़ अपने समुदाय के बल्कि सभी के अधिकारों के लिए सड़क की लड़ाई लड़ रही हैं।

महिलाओं की ताक़त

चाहे शाहीन बाग़ की दादियाँ हों या पुलिस से भिड़ती कॉलेज की लड़कियाँ या फिर कृषि बिलों के ख़िलाफ़ गाँव-गाँव से राष्ट्रीय राजधानी का सफ़र तय करने वालीं महिलाएं,औरतें अब चुपचाप सब कुछ होते नहीं देखतीं,वो बदलाव का हिस्सा बनती हैं। वो कभी शांत प्रदर्शनकारी होती हैं तो कभी सरकारों से लोहा लेतीं है।

महिलाओं की ये ताक़त अब मीडिया और सोशल मीडिया भी पहचान रहा है। वो बाहर आ रही हैं, खुलकर बात कर रही हैं और कोई उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा। यहां तक कि पुलिस की लाठियों का मुक़ाबला करतीं मज़बूत नज़र आरही है महिलाएं।

किसान आंदोलन में महिलाये भी यहां से हिलने के लिए तैयार नहीं है और लगातार रामलीला मैदान या जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपनी मांग पर कायम हैं। ये किसान केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ यहाँ बड़ी संख्या में बीते नौ दिनों से जुटे हैं।

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