कई रंग-बिरंगे ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए हुए ‘पैठण’ है बहुत ही खूबूसूरत और खास

चौड़े पाट की गोदावरी नदी के तट पर बसा है पैठण। गोदावरी नदी को ससम्मान ‘दक्षिण की गंगा’ भी कहा जाता है। आप पैठण को गोदावरी का जलमग्न नेत्र भी कह सकते हैं, पवित्र पैठण की वह आंख, जिसमें बहती गोदावरी की जलधारा जैसे नदी का लहराता आंचल हो। इस प्राचीन नदी से मिलता-जुलता पैठण का इतिहास भी पुरातन है। महाराष्ट्र पैठण के बिना अधूरा है।

पैठण को ‘संतों की भूमि’ भी कहा जाता है। यह स्थान वैष्णववाद के निम्बार्क सम्प्रदाय परंपरा के संस्थापक श्री निम्बार्क का जन्मस्थान भी है। इस शहर को ‘दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र’ के लिए भी जाना जाता है।

ग्रीक लेखक एरियन ने पैठान को ‘प्लीथान’ कहा और भारत की यात्रा करने वाले मिस्त्र के रोमन भूगोलविद टॉलमी ने इसका नाम ‘बैथन’ लिखा है और इसे ‘सित्तेपोलोमेयोस’ (सातवाहन नरेश श्री पुलोमावी द्वितीय 138-170 ई.) की राजधानी बताया है। ‘पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रियन सी’ के अज्ञात नाम लेखक ने इस नगर का नाम ‘पोथान’ लिखा है।

पुरातन पैठण की महिमा आपको पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ में भी मिलेगी। यह स्थान योद्धाओं,संतों और सूफियों का संगम रहा है। देशभर से लोग तीर्थाटन के लिए पैठण आते हैं। पैठण का आदर तीर्थ स्थल के रूप में अधिक होता है। विदेशी पर्यटक भी यहां खूब आते हैं। धर्म-संस्कृति-सभ्यता-इतिहास के लिए पैठण उनके सामने खुली किताब की तरह है, इसीलिए वे अपने भ्रमण को स्टडी टूर की संज्ञा देते हैं।

पैठण से जुड़ने का सबसे सुलभ साधन बस सेवा है। यहां पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट औरंगाबाद शहर में है। वैसे यहां सभी मौसमों में आया जा सकता है, पर सबसे बेहतर एकनाथ षष्ठी उत्सव का समय है, जिसका आयोजन मार्च के महीने में होता है। यह संत एकनाथ की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होता है।

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