जाति और धर्म के राजनीतिक समीकरणों में दम तोड़ते भारत का अटल सत्य!

श्वेता त्रिपाठी(Edited by VIKAS GOSWAMI): अगर कोई भारत के विषय में पूछे तो हमारा जवाब होता है, सशक्त , विकासोन्मुख, मज़बूत, साधनसंपन्न और आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा कूटनीतिक रूप से वैश्विक पटल पर तेजी से उभरता भारत। बात सही भी है एक बढ़िया  GDP ,अच्छे वैदेशिक संबंध, ज्यादा मैनपॉवर और उभरती अर्थव्यवस्था , ये सब मिलकर भारत को एक शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित करते हैं।

       लेकिन हमारे वहा बड़े बुजुर्ग एक कहावत कहते है- “हर सिक्के के दो पहलू होते हैं “।
     तो आइये आपको तस्वीर के पीछे की पृष्ठभूमि का तरफ लिये चलते हैं और ये धरातल है|  जातिगत बेड़ियों में बंधे और धर्म के समीकरणों में टूटते भारत का। भारत विभिन्नताओं का देश है अनेक भाषाओं, जातियों और संप्रदायों के लोग यहाँ रहते हैं। भारत में सर्वाधिक संख्या हिन्दू धर्मावलम्बियों की है लगभग 79.8%। इसके बाद इस्लाम यहाँ 14.2%के साथ दूसरा सबसे बड़ा संप्रदाय है। कहने के लिये तो यहाँ हिन्दू सर्वाधिक हैं लेकिन ये हिन्दू  79.8% हिन्दू के रूप में न रहकर 5% ब्राह्मण, 3.7% राजपूत, 6.8%यादव ,25%दलित 27%OBC आदि के रूप में बँटे हुये हैं।
राजनीतिक विमर्श की बात करें तो सब एक सुर में ये निर्णय सुना देंगे कि देश के राजनैतिक दल लोगों की जातीय और धार्मिक भावनाओं को भड़काते है जिससे वे अपना चुनावी उल्लू सीधा कर सकें लेकिन कभी सोचा है कि हमारी भावनायें आखिर भड़क क्यों उठती हैं ?क्योंकि हम अपने अंदर अपने ही भाई बंधुओं के लिये नफ़रत का ज़हर लिये बैठे हैं।
क्योंकि कहीं न कहीं हम ऐसी भावनाओं को अपने दिलोदिमाग़ में पाल बैठे हैं जो “वसुधैव कुटुम्बकम” की धारणा रखने वाले भारत देश में अपने ही समाज के एक व्यक्ति को केवल इसलिये अछूत घोषित कर देती हैं क्योंकि वह एक तथाकथित नीची जाति का है।
क्या किसी के जीवन, सम्मान और सामाजिक न्याय के अधिकार केवल इसलिये छीन लिये जायेंगे क्योंकि वह उच्चकुल से संबंध नहीं रखता। विकसित और शहरी इलाकों में तो जातियों के अंतर की खाई पटती नज़र आती है लेकिन भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांवों में कोई सुधार देखने को नहीं मिलता नतीजन हम सब ने अपनी अपनी सीमारेखायें निर्धारित कर ली है कि मैं ब्राह्मण हूं , तुम ठाकुर हो, फलां यादव है, फलां दलित हैं और इसी जातिगत अलगाव का फायदा उठाते हैं राजनैतिक दल ।धर्म भी इससे अछूता नहीं रहा है एक दूसरे के धर्मविरोधी धारणाओं ने हज़ारों सांप्रदायिक दंगों में लाखों परिवार बर्बाद किये हैं।राजनीति के लिये तो ये विषय केवल धंधा बनकर रह गये हैं। किसी दल ने ब्राह्मणों का ठेका ले रखा है किसी ने यादवोंं का तो किसी ने दलितों और मुसलमानों का।
          हमारे बीच की खाई खुद हमारी बनायी हुई है जिसका ये राजनितिक पार्टियाँ भरपूर फायदा उठाती हैं क्योकि हमने ये धारणा बना ली है कि जिस समुदाय विशेष का व्यक्ति सत्तासीन होगा वह केवल उसी समुदाय विशेष के लिये काम करेगा और अन्य समुदायों से द्वेष की भावना रखेगा।देखा जाय तो ऐसा होता भी है।लेकिन ये खुद से पूछने का वक्त है कि क्या केवल इसलिये एक व्यक्ति को मत देना उचित होगा  क्योंकि वह हमारी जाति का है ? क्योंकि उसके सत्तारूढ़ होने से केवल हमारी कम्यूनिटी का विकास होगा? अगर हाँ तो जाति और वर्ण के लिये मनुस्मृति को दोष देना बंद कीजिये यक़ीन मानिये आप इस जातिवाद के बँटवारे की आंधी में स्वयं को अंधा बनाने के खुद ज़िम्मेदार हैं।
      इन जातीय विभाजनों ने भारतवर्ष की बड़ी दुर्दशा की है । अरबों , तुर्कों और बाबर के आक्रमण के समय अपनी तुच्छ सीमाओं और मर्यादाओं में उलझे राजपूतों में फूट पड़ी तो हमने 300 साल मुसलमानों की गुलामी की। थोड़े से धन की लालच में भारतीय नवाबों और राजाओं ने विधर्मियों का साथ देकर स्वराष्ट्र और स्वधर्म से गद्दारी की तो 200 साल अंग्रेज़ी हुकूमत भी देखी। धर्म और जाति की कट्टरताओं से पीड़ित भारतवर्ष ने अपनी एकता और अखण्डता को तार तार होते हुये भी देखा जब धर्म के नाम पर पाकिस्तान को अलग कर दिया गया और भाषा के नाम पर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश दो राज्य बँट गये।
सोचते हुये डर लगता है लेकिन अगर ऐसे ही चलता रहा तो संभव है किसी दिन सब अपनी अपनी जातियों,धर्मों और समुदायों के नाम पर अलगाववाद का झंडा बुलंद कर लें और अखण्ड भारत की जो कल्पना हमारे महापुरूषों ने की थी वो एक भ्रममात्र बनकर रह जाये।
  ज़रा ठहरकर सोचने की ज़रूरत है कि यदि केवल समाज के किसी एक वर्ग के लिये कार्य किया जाय और इसके लिये अन्य वर्गों और समुदायों को नीचा दिखाया जाय तो क्या किसी राष्ट्र का विकास संभव हो सकेगा? नहीं न ! तो फिर क्यों हम इन तुच्छ चीजों को बढ़ावा देकर अपना और देश का भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं। अब जरूरत है इस कट्टरता का जुआ कंधे से उतार फेंकने की जिससे हम, भारत के लोग भारत को एक स्वस्थ लोकतंत्र और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने में हिस्सेदार बन सकें।
  श्वेता त्रिपाठी
स्नातक (द्वितीय वर्ष)
दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय
गोरखपुर

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