दुनिया का एक इकलौता रेप म्यूज़ियम ! जानें इसके बारे में …

अगर आपको अपने आसपास मौजूद किसी चीज, व्‍यक्ति या फिर जगह से डर लगता है तो जाहिर है आप उससे दूर भागते होंगे । और कोशिश करते होंगे कि आपको उस चीज, जगह और व्‍यक्ति का कभी सामना न करना पड़े।

मगर डर को दूर भगाना के लिए उसका सामना तो करना ही पड़ेगा | यह कहना है बेंगलुरु बेस्‍ड आर्टिस्‍ट एवं एक्टिविस्‍ट जसमीन पथेजा का। जसमीन की यह बात हो सकता है कि कुछ समय के लिए ही आप में जोश भर दे| मगर उनको जानने के बाद आप चौंक जायेंगे और उनके लिए इज्ज़त थोड़ी और बढ़ जाएगी |

जसमीन बहुत ही अनोखे ढंग से महिलाओं के साथ होने वाली रेप की घटनाओं का विरोध करती हैं। वह रेप विक्टिम्‍स के कपड़ों को कलेक्‍ट करती हैं जिसमें उनका रेप हुआ था या फिर उन्‍हें किसी भी प्रकार से सेक्सुअली हैरस किया गया था। जसमीन को ऐसा करते हुए काफी वक्‍त बीत गया है। वह इन कपड़ों की जगह-जगह प्रदशर्नी भी लगाती हैं । इन कपड़ों को इकट्ठा करते-करते उन्‍होंने अपने घर पर ही एक अनोखा म्‍यूजियम बना डाला है।

 

क्‍या है कारण-

ऐसा करने के पीछे वह बेहद रोचक कारण बताती हैं, ‘मेरे नाना नानी का घर लखनऊ में था। उनके घर के सामने एक बहुत ही अच्‍छा पार्क था। मैं बचपन में जब वहां जाती तो मां को उस पार्क में चलने को बोलती, मगर मां हमेशा वहां जाने से यह कह कर मना कर देती कि वह पार्क अच्‍छा नहीं है, वहां गंदे लोग आते हैं।

मां की बातें मुझे समझ नहीं आती थी। उस वक्‍त न तो मैं खराब जगह का मतलब समझ पाती और न ही गंदे लोग कैसे होते हैं मुझे इस बात का अहसास होता। थोड़ी बड़ी हुई तो जगह के साथ ही लोगों ने मुझे यह भी सिखाना शुरू कर दिया कि मुझे अपनी चाल सही करनी चाहिए और तन कर चलने की जगह थोड़ा झुक कर चलना चाहिए। क्‍योंकि तन कर चलने में सीना उभरता है।

इसलिए झुक कर चलने को कहा जाता। मगर मैं नहीं मानती थी। मैं 13 साल की हो चुकी थी, मगर खराब और गंदी फीलिंग क्‍या हाती है इसका कोई अंदाजा नहीं था। मगर एक दिन स्‍कूल से घर आते वक्‍त एक आदमी ने मुझे गलत तरह से छूने की कोशिश की। जब तक मैं कुछ समझ पाती तब तक वह अपनी हसरत पूरी करके वहां से भाग चुका था। उस दिन मैं डर गई।

मुझे अच्‍छे और बुरे का अहसास भी हो गया। उस दिन के बाद मैं बैग आगे की तरफ तांग कर और डरते सहमते हुए घर जाती कि कहीं फिर से कोई आदमी मेरे साथ ऐसा करके न चला जाए। यह बात मैंने किसी को नहीं बताई थी। उस दिन से डर के साथ एक रिश्‍ता बन गया था। मगर धीरे धीरे इस डर को समझने और जानने की इच्‍छा जागी। तब मैंने डर का यौन शोषण से क्‍या रिश्‍ता है यह जानने के लिए ब्‍लैंक नॉइज की शुरुआत की। ’

 

क्‍या है ब्‍लैंक नॉइज-

यह एक ऐसी कम्‍यूनिटी है, इस में स्‍ट्रीट सेक्सुअली हैरेसमेंट जिसे आम भाषा में ईव टीजिंग या छेड़खानी कहते हैं, को लेकर महिलाओं में पैदा होने वाले डर को खत्‍म करने और उस डर से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है।

जसमीन इस कम्‍यूनिटी की फाउंडर मेंबर हैं। इस कमयूनिटी की शुरूआत जसमीन ने अपने कॉलेज के दौरान आर्ट प्रोजेक्‍ट के तौर पर की थी, जो बाद में देश भर में पॉप्‍यूलर हो गई। इस कम्‍यूनिटी का मकसद देश से यौन हिंसा को खत्‍म करना है। वह बताती हैं, ‘प्रोजेक्‍ट की जब शुरूआत की थी तब एक सर्वे किया था और बेंगलूरु की सड़कों पर घूम घूम कर महिलाओं से यह जानने की कोशिश की थी कि वो कौन सी चीज है जिसके बिना वह अपने घर से बाहर नहीं निकलतीं।

तब पता चला कि वे सेफ्टी वेपन्‍स के तौर पर सेफ्टी पिन, कॉक्रोच स्‍प्रे, लाल मिर्च पाउडर और चाकू जैसी चीजों को बैग में रखती है। तब पहली बार अहसास हुआ था कि महिलाएं अपने ही देश, अपने ही शहर की सड़कों पर कितनी असुरक्षित हैं।’

 

प्रोजेक्‍ट को कैसे बढ़ाया आगे-

कॉलेज तो खत्‍म हो गया मगर जसमीन ने अपने प्रोजेक्‍ट को बंद नहीं किया बल्कि उसे एक कैंपेन का रूप दिया और उसका नाम ‘आई नेवर आस्‍क फॉर इट ’ रखा। जसमीन बताती हैं, जब भी कोई रेप या छेड़खानी की खबर आती है तो उसके साथ लोगों के कॉमेंट्स भी आते हैं और कई लोग घटना का कारण महिलाओं के कपड़ों को बताते हैं। इसलिए मैंने महिलाओं से पूछना शुरू किया कि जब आपके साथ सेक्सुअली हैरसमेंट हुआ तो आपने कौन से कपड़े पहन रखे थे।

 

जाहिर है जब आपके साथ इस तरह की घटना घटती है तो आप कभी भी उस दिन, आपने क्‍या पहना था, नहीं भूल पातीं। मैं खुद आज तक अपनी यूनीफॉर्म को नहीं भूल पाई हूं।  जब मैंने यह सवाल किए तो बड़े रोचक जवाब मिले।

किसी ने कहा मैंने कुर्ता पहना था , किसी ने तो यह तक कहा कि उस वक्‍त उसने बुर्खा पहना हुआ था। बड़ा आश्‍चर्य हुआ यह जान कर कि जिस औरत का चहरा भी नहीं दिख रहा उसके साथ यौन शोषण हो रहा है सड़क पर । तब मैंने तय किया कि मैं उन लोगों को इस बात का अहसास दिलाउंगी, जो महिलाओं के साथ हो रही इन घटनाओं के लिए उनके पहनावे को दोष देते हैं।

 

कैसे बनाया म्‍यूजियम-

बुलंद हौसलों और पक्‍के इरादों के साथ जसमीन ने महिलाओं की एक टोली बनाई और यौन शोषधण का शिकार हो चुकी महिलाओं से बात कर उनके कपड़े इकट्ठा करना शुरू किए।

अब इन्‍हीं कपड़ों को जसमीन जगह जगह प्रदर्शनी के तौर पर लगाती हैं और कपड़ो के साथ यौन शोषण की तारीक और जगह भी डिसप्‍ले करती हैं। इसके जरिए वह लोगों को बताती हैं कि यह पुरुषों की मानसिकता है जो रेप जैसी घटनाओं को अंजाम देती है न कि महिलाओं के कपड़े। वह कहती हैं, ‘पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अकेली, आवारा आजाद जीने का अधिकार है और मैं उन्‍हें यह अधिकर दिला कर रहुंगी। ’

 

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