इस मंदिर में नहीं है कोई देवी देवता, होती है कुत्‍तों की पूजा

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कुत्तों की पूजाइसे विश्वास कहें या अंधविश्वास कहें लेकिन यह सच है की भारत में ऐसे कई मंदिर है जहां देवी- देवताओं की नहीं बल्कि कुत्तों की पूजा होती है। बात जब आस्था की आती है तो विश्वास और अंधविश्वास में लोग फर्क कम ही समझ पाते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बताएंगे जहां कुत्ते की समाधि या कब्र बनी है और भक्त यहां पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं।

झांसी में एक छोटा-सा मंदिर एक कुतिया को समर्पित है। इस मंदिर में लोग दीया, फूल,प्रसाद चढ़ाकर पूजा करते हैं। झांसी में ककवारा और रेवान नाम के दो गांवों के बीच की सीमा पर बने इस मंदिर में डॉगेस की देवी मानकर पूरा की जाती है। दूसरे मामलों की तरह इस बारे में भी कथा प्रचलित है। इस मंदिर के पुजारी नियमित रूप से यहां बाकी मंदिरों की तरह पूजा-अर्चना करते हैं।

कर्नाटक के गांव में बना है कुत्ते का मंदिर कर्नाटक के रामनगर जिले के अंतर्गत आनेवाले गांव चिन्नपटना गांव में कुत्ते का मंदिर बना है। स्थानीय लोगों का मानना है कि कुत्ते में अपने मालिक के परिवार को विपत्तियों से बचाने की प्राकृतिक शक्ति होती है। वह किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा को भी पहले ही भांप लेते हैं, इसलिए इस मंदिर को इस पालतु जानवर को समर्पित किया गया है।

गाजियाबाद के पास स्थित चिपियाना गांव में भैरव बाबा का मंदिर है। यहां बनी कुत्ते की समाधि लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। कुत्ते की समाधि के पास एक हौदी बनी हुई है। ग्रामीण सतपाल चौधरी के अनुसार, मान्यता है कि हौदी में नहाने से कुत्ते के काटने का असर समाप्त हो जाता है। कुत्ते की प्रतिमा पर लोग बकायदा प्रसाद चढ़ाते हैं और उसे एक-दूसरे को बांटते हैं। इस मंदिर में लक्खा बंजारे के कुत्ते का मंदिर है।

बुलंदशहर से 15 किमी. दूर औद्योगिक क्षेत्र सिकंदराबाद में करीब 100 साल पुराना एक ऐसा मंदिर है, जहां कुत्ते की कब्र की पूजा होती है। होली, दीपावली को यहां मेला भी लगता है। सावन और नवरात्रों में भण्डारे का भी आयोजन होता है। ऐसी मान्यता है कि यहां मांगी गई मन्नत पूरी होती है, इसलिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। यह मंदिर एक साधु लटूरिया बाबा के कुत्ते को समर्पित है, जिनसे साधु के प्राण त्यागने के बाद वहीं अपनी जान दे दी थी।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से कुकुर खांसी और कुत्ते के काटने का भय नहीं रहता है। कुत्ते के अतिरिक्त इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। जानकारी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं से15 वीं शताब्दी के बीच कराया गया।

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