एक परिवार, 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार

manmohan jha
प्रोफेसर मनमोहन झा

पटना| मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल देश की सर्वोच्च साहित्यिक स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी से पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार पुरस्कार के लिए प्रोफेसर मनमोहन झा के कथा संग्रह ‘खिस्सा’ को चुना गया है। संयोगवश प्रो. झा के परिवार में यह तीसरा साहित्य अकादमी पुरस्कार आने वाला है।

बेटी की विदाई तक में देते हैं लोग इनकी किताबें

प्रो. मनमोहन झा दरभंगा स्थित ललित नारायण मिश्र मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर (पीजी) मनोविज्ञान विभाग के प्राध्यापक हैं। वह प्रसिद्ध मैथिली कथाकार प्रो. हरिमोहन झा के सबसे छोटे बेटे हैं। पटना विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे हरिमोहन झा ‘प्रणम्य देवता’, ‘खट्टर काकाक तरंग’ व ‘रेलक बात’ जैसे हास्यकथा संग्रहों से तीन पीढ़ियों के बीच चर्चा में रहे हैं। उनके ये तीनों कथा संग्रह हिन्दी में भी आ चुके हैं, इसलिए बिहार के बाहर भी साहित्य प्रेमी उन्हें अच्छी तरह जानते हैं। प्रो. हरिमोहन झा की लोकप्रियता का आलम यह रहा है कि आज से 50 साल पहले आए उनके उपन्याय ‘कन्यादान’ और ‘द्विरागमन’ को इतना पसंद किया गया कि मिथिलांचल में लोग अपनी बेटी की विवाह के बाद विदाई के समय संदेश के रूप में ये दोनों किताबें जरूर देते थे।

सम्‍मान का सिलसिला यूं चल रहा

‘कन्यादान’ उपन्यास पर 1970 के दशक में मैथिली फिल्म भी बन चुकी है। प्रो. हरिमोहन झा को वर्ष 1985 में उनकी संस्मरणात्मक कृति ‘जीवन यात्रा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था। इनके सबसे बड़े बेटे राजमोहन झा को वर्ष 1996 में ‘आइ काल्हि परसू’ कथा संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इन्हीं के अनुज प्रो. मनमोहन झा के हाथों में अगले साल 16 फरवरी को साहित्य अकादमी पुरस्कार आने वाला है। प्रो. झा वैशाली जिले के कुमर वाजितपुर गांव के रहने वाले हैं। मैथिली भाषा के लिए गठित तीन सदस्यीय निर्णायक मंडली ने उनकी कृति ‘खिस्सा’ का चयन पुरस्कार के लिए किया है। ये तीन निर्णायक हैं डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ. इंद्रकान्त झा और डॉ. माधुरी झा।

अनुवाद भी कर चुके

मनमोहन की कृतियों में उनके अग्रज राजमोहन की लेखन शैली की छाप नजर आती है। मनमोहन स्वयं कहते हैं कि लेखनशैली में उन्होंने अपने अग्रज का अनुकरण किया है और उन्हीं की शैली पर लिखना प्रारंभ किया था। इनके जीजा डॉ़ शैलेन्द्र मोहन झा भी मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार रहे हैं। ‘पथ हेरथि राधा’ और ‘मधुश्रावणी’ उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं। साहित्य अकादमी के लिए वह कई पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

पुरस्‍कार से उत्‍साह और बढ़ा
प्रो. मनमोहन झा ने कहा, “पुरस्कार मिलने की घोषणा से मुझे खुशी हुई, लिखने का उत्साह और बढ़ा है। गर्व महसूस हो रहा है कि यह पुरस्कार परिवार के तीसरे सदस्य को मिलने जा रहा है।” वह मानते हैं कि उत्कृष्ट साहित्य लेखन से मैथिली भाषा समृद्ध जरूर हुई है, लेकिन इसे और भी समृद्ध करने की जरूरत है। प्रथम गद्यकार ज्योतिरीश्वर और महाकवि विद्यापति की इस प्राचीन भाषा को आगे बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। ‘खिस्सा’ के अलावा प्रो. झा के अन्य कथा संग्रह हैं ‘घर घुरैत काल’ और ‘कोनो एकटा गाम’। वह कहते हैं, “किसी भी लेखक के लिए उसकी सभी रचनाएं प्रिय होती हैं, लेकिन यह पाठक को तय करना होता है कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी लगती है।”

प्रो. झा ने बताया कि पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने साहित्य लेखन शुरू कर दिया था। घर में साहित्यिक माहौल था। पिता और अग्रज के लेखन से निरंतर प्रेरित होते रहे। उन्होंने कहा कि उनका विषय मनोविज्ञान रहा है, इसलिए उनकी रचनाओं में भी इसका पुट दिखता है।

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