आज नेताजी का 125वां Happy Birthday है, जानिये उनकी ज़िन्दगी से जुड़े कुछ रहस्य

नई दिल्ली: आज उस क्रांतिकारी का जन्मदिन है जिसने स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनने के लिए भारतीय सिविल सेवा की आरामदेह नौकरी को ठुकरा दिया था. एक ऐसा क्रन्तिकारी जिसे 11 बार कैद किया गया लेकिन उसके हौसले कभी किसी की कैद में नहीं आये. गुलामी के दौर में एक ऐसा भारतीय सिपाही जिसने लड़ाकों की फ़ौज तैयार कर दी थी. जिसका मकसद सिर्फ एक था आजादी आजादी बस आजादी. तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा के नारे से भारत के जन-जन में एक नई उर्जा पैदा करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का आज 125वां जन्मदिन है.

23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक बंगाली परिवार में जन्में नेताजी सुभाष चंद्र बोस शुरू से ही काफी तेज तर्रार मिजाज के थे.

सुभाष चन्द्र बोस के रग-रग में बहता देश प्रेम

भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त करने वाले सुभाष चन्द्र बोस के देशप्रेम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1921 में उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा को सिर्फ इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि उन्हें भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराना था.

दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उनका कहना था कि हमारी लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा।

16 मार्च 1939 को बोस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। नेताजी ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को इसका हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया, और उन्हें संगठित किया।

5 जुलाई 1943 को ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।

‘तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा’

12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में नेताजी ने भाषण देते हुए कहा- ‘अब हमारी आजादी निश्चित है, लेकिन आजादी बलिदान मांगती है। इसलिए तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा।  यही से आन्दोलन को एक नई हवा मिल गई, देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाले सुभाष के ये वाक्य भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

सुभाष चन्द्र बोस के मौत का रहस्य

ऐसा माना जाता है की 18 अगस्त 1945 को नेताजी की मौत जापान के टोक्यों शहर में एक प्लेन एक्सीडेंट में हुई थी. लेकिन इस बात के अभी तक कोई भी पुख्ता सबूत नहीं मिले है. 1999 में गठित जस्टिस कमेटी ने 2006 में अपनी रिपोर्ट में नेताजी की प्लेन क्रैश में हुई मौत को यह कहकर मानने से इनकार कर दिया कि जो राख टोक्यो के रकंजी मंदिर में रखी गई है वो नेता जी की नहीं है. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जो राख मिली है वो किसी जैपनिस सोल्जर की है. लेकिन कमेटी की इस रिपोर्ट को भारत सरकार ने ठुकरा दिया था.

नेताजी हर दिल में अमर

मौत कैसे हुई, कहा हुई, कब हुई ये आज भी एक रहस्य है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि जन्म हुआ था, एक ऐसे वीर का जो निडर और साहसी था. जिसके लहू में भारत बहता था. जिसका मकसद भारत को किसी भी कीमत पर आज़ाद कराना था. जय हिन्द का नारा देने वाले एक ऐसे महापुरुष का जो अमर था अमर है और अमर रहेगा.

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