भारत सेवक संघ से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफ़र, जानिए शास्त्री का राजनीतिक इतिहास

लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री

लखनऊ: अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद शास्त्री भारत सेवक संघ से जुड़ गए, और यही से उनकी राजनीतिक सफ़र की शुरुआत हुई. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पदचिन्हों पर चलने वाले शास्त्री ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी आन्दोलनों में हिस्सा लिया. जिनमें से असहयोग आन्दोलन (1921), दांडी मार्च (1930), भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) प्रमुख रहे.

दुसरे विश्वयुद्ध में जब गाँधी जी ने करो या मरो का नारा दिया, तो मौके की नजाकत को समझते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने बड़ी ही चतुराई से गाँधी जी के नारे को बदलकर ‘मरो नहीं, मारो’ में तब्दील कर दिया. उनके इस नारे से उन्होंने पूरे भारत में अंग्रजों के खिलाफ आन्दोलन को एक नई हवा दे दी. पूरे 11 दिन तक अंडरग्राउंड रहते हुए शास्त्री ने इस काम को अंजाम दिया. लेकिन ठीक 11 दिन बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्री गिरफ्तार कर लिए गए.

इलाहबाद में रहते हुए शास्त्री की नजदीकियां जवाहर लाल नेहरु से बढ़ने लगी. लगातार शास्त्री का कद बढ़ने लगा. देखते ही देखते लाल बहादुर शास्त्री को नेहरु के कैबिनेट में जगह मिल गई और उन्हें गृह मंत्रालय का पदभार सौंप दिया गया.

गृह मंत्रालय से प्रधानमन्त्री कार्यालय

27 मई 1964 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु का निधन हो गया. इसके बाद शास्त्री की काबिलियत और कार्यकुशलता को देखते हुए 09 जून 1964 में देश के प्रधानमन्त्री की जिम्मेदारी सौंप दी गई. महज 18 महीने के कार्यकाल में शास्त्रीने बढ़-चढ़कर देश सेवा की.

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