खिलौने मिले तो खिले बच्चों के चेहरे

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आगरा। न बचपन वाली उमंग है न ही कोई शरारत। आंखों में परियों के सपनों के बजाय, कैद से छूटने के इंतजार की चिंता। यह वो बचपन है जिसने कोई गुनाह नहीं किया। फिर भी बचपन जेल में बीत रहा है। अपराध है तो सिर्फ यह कि वह उस मां के बच्चे हैं, जिन्हें जाने अनजाने में हुए अपराध की जेल में कुछ वर्षों की सजा मिली है। ऐसे बच्चों की मदद के लिए कोहिनूर क्लब (लायन्स क्लब) की सदस्याओं ने हाथ आगे बढ़ाया है।

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