आखिर क्यों पड़ा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह ‘हाथ का पंजा’? जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

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नई दिल्ली। जब भी देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का जिक्र किया जाता है, तो सबसे पहले जुबां पर कांग्रेस का नाम ही आता है, जिसने भारत की आजादी में महत्वपूर्व भूमिका निभाई है। वर्ष 1885 में अस्तित्व में आया यह राजनैतिक दल आज हाथ के पंजे से पहचाना जाता है, जो आज इस दल का चुनाव चिह्न है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि हाथ का पंजा शुरू से कांग्रेस का चुनाव निशान नहीं है। यह चुनाव निशान इंदिरा गांधी के कार्यकाल में आपातकाल के बाद कांग्रेस को मिला है, जो देवरहा बाबा की देन है।

देवरहा बाबा के भक्तों का कहना है कि बाबा बहुत ही सहज, सरल और सादा जीवन जीने वाले बाबा मे से एक थें। इनसे मिलने के लिए देश-दुनिया के बड़े-बड़े लोग आते थें। भक्तों का कहना है कि देश मे आपातकाल के बाद चुनाव हुए जिसमें इंदिरा गांधी हार गईं। लोगों का कहना है कि देवरहा बाबा से आशीर्वाद लेने के लिए इंदिरा गांधी भी बाबा के पास पहुंची थीं। बाबा ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। वहां से लौटने के बाद इंदिरा जी ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा ही रख दिया। इसी चिह्न पर 1980 में इंदिरा चुनाव लड़ी और प्रचंड बहुमत प्राप्त कर देश की प्रधानमंत्री बनीं।

बाबा के बारे में बताया जा रहा है कि मचान पर बैठे-बैठे ही अपने भक्तों को धन्य करते थें। बाबा के कई भक्तों का दावा है कि वो भक्तों की बात होंठों तक आने से पहले ही बाबा उनके मन की बात को पढ़ लेते थें।।

जॉर्ज पंचम सन् 1911 मे भारत आए उन्होंने देवरिया जिले के मइल गांव में बाबा के आश्रम पहुंचे। उन्होंने बाबा के साथ क्या बात की यह सिर्फ उनके शिष्यों को पता है। उनके शिष्यों ने कभी भी यह किसी को नहीं बताया कि जॉर्ज पंचम की बाबा से क्या बात हुई। चार खंभों पर टिका मचान ही उनका महल था। जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थें।

बनारस मे कुछ दिन रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के मठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में भी रहते थें। फिर अचानक 11 जून 1990 से बाबा अपने भक्तों को दर्शन देना बन्द कर दिया।

अगले मंगलवार को योगिनी एकादशी थी, आकाश में काले बादल छा गए। तेज आंधी-तूफान आया। यमुना की लहरें बाबा के मचान तक पहुंचने लगीं और शाम 4 बजे बाबा ने शरीर को त्याग दिया।

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