सेप्सिस से पीड़ित 50 फीसदी मरीजों को ही मिल पाता है जीवन

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आगरा। अस्पताल में कितनी भी बेहतर सुविधा हो, लेकिन सेप्सिस जैसी बीमारी में मात्र 50 पीसदी लोगों को ही जीवन मिल पाता है। इसकी वजह है रक्त के माध्यम से एक साथ कई अंगों में इनफेक्शन का पहुंचना और मरीज का ऐसी अवस्था में लापरवाही बरतना। इस समस्या से बचने का तरीका सिर्फ जागरूकता है, जो मरीज के छोटे से इनफेक्शन को सेप्सिस तक तब्दील होने ही न दें।

वर्कशॉप में दी गईं नर्सों को ट्रेनिंग

यह बातें देहली गेट स्थित मधुवन प्लाजा में सेप्सिस डे पर आयोजित बेसिक ट्रोमा क्रिटिकल केयर विषय पर आयोजित वर्कशॉप में डॉक्टरों ने ट्रेनिंग के दौरान उन नर्सों को बताई जो चिकित्सा सेवा की रीड मानी जाती हैं। इंडियन सोसायटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन द्वारा आयोजित इस वर्कशॉप में लगभग 30 नर्सों को थ्योरी, प्रक्टीकल व डेमों के माध्यम से ट्रेनिंग दी गई। सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. रणवीर सिंह त्यागी ने बताया कि सेप्सिस में मृत्युदर लगभग 50 फीसदी है। वह भी बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद। सोसायटी की सचिव डॉ. दीप्तीमाला अग्रवाल ने इसके इलाज, लक्षण व कारणों के बारे में बताया। डॉ. राकेश त्यागी, डॉ. जितेन्द्र सिंह व डॉ. पायल सक्सेना बी नर्सिंग स्टॉफ को प्रशिक्षण दिया। सभी नर्सों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए गए।

क्या है सेप्सिस

डॉ. दीप्तिमाला अग्रवाल ने बताया कि सेप्सिस में किसी एक अंग का इनफेक्शन ब्लड स्ट्रीम में आकर एक साथ कई अंगों में संक्रमण कर देता है। ऐसी स्थिति में सांस तेज चलती है, पल्स रेट बढ़ जाती है। पेशाब कम आता है। बुखार तेज व अप एंड डाउन भी हो सकता है। सेप्सिस की स्थिति में सामान्य बुखार की तरह पैरासीटामोल से बुखार नहीं उतरता। यदि उतरता भी है तो सिर्फ दवा लेने के दौरान तक और फिर चढ़ जाता है। इसमें हैवी एंटीबॉयटिक दवाएं प्रयोग होने के कारण इलाज बहुत महंगा होता है, इसलिए इलाज से बेहतर पहले से सावधानी बरतना ज्यादा अहम है।

आईसीयू में बेहद महत्वपूर्ण है नर्सों का योगदान

आम मरीजों की तुलना में आईसीयू में भर्ती मरीजों को ठीक होने में नर्सों का विशेष योगदान होता है। क्योंकि आसीयू में या तो मरीज वेंटीलेटर पर होता है या फिर कुछ प्रतिक्रिया न कर पाने जैसी गम्भीर स्थिति में। ट्रेनिंग के दौरान नर्सिंग स्टॉफ को विशेषतौर पर आईसीयू में भर्ती मरीजों की देखरेख के बारे में बताया गया।

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