World Malala Day:  लड़कियों की शिक्षा के लिए लड़ीं, तालिबान की गोलियां भी खाई… फिर भी नहीं रुकी मलाला युसुफ़ज़ई

परंपरागत लिबास और सिर पर दुपट्टा, देखने में मलाला युसुफ़ज़ई (Malala Yousafzai) अपनी उम्र की अन्य लड़कियों की तरह ही लगती है।

लखनऊ: परंपरागत लिबास और सिर पर दुपट्टा, देखने में मलाला युसुफ़ज़ई (Malala Yousafzai) अपनी उम्र की अन्य लड़कियों की तरह ही लगती है। उनके बारे आपको जानकर काफी हैरानी होगी, दृढ़ निश्चय से भरी आंखें, कुछ कर गुजरने का हौसला उन्हें सबसे खास बनाती हैं। सबसे कम आयु में नोबल पुरस्कार (Nobel Prize) हासिल करने वाली मलाला शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ रही हैं।

मलाला युसुफ़ज़ई एक पाकिस्तानी एक्ट्वीसट और मिंगोरा शहर की रहने वाली मामूली सी छात्रा है। जो की लंम्बे समय से लड़कियों की शिक्षा के लिया लड़ रही हैं। 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात इलाके में एक टीचर जियादुददीन युसूफजई के यहां मलाला का जन्म हुआ है। वहां लड़कियों को स्कूल भेजने का चलन अधिक नहीं था, किन्तु छोटी सी मलाला अपने बड़े भाई का हाथ पकड़कर स्कूल जाती थी और खूब मन लगाकर पढ़ाई करती थी।

11 साल की उम्र में ही मलाला ने लिखी डायरी

आपको बता दें, 11 साल की उम्र में ही मलाला ने डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। वर्ष 2001 में छद्म नाम “गुल मकई” के तहत BBC ऊर्दू के लिए डायरी लिख मलाला पहली बार दुनिया की नज़र में आई थी। डायरी लिखने की शौकीन मलाला ने अपनी डायरी में लिखा था, ‘आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज्‍यादा देर खेलने का फ़ैसला किया। मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी।’

मलाला युसुफ़ज़ई
मलाला युसुफ़ज़ई

ब्लॉग लिखने पर मिली धमकियां

मलाला ने ब्लॉग और मीडिया में तालिबान की ज्यादतियों के बारे में जब से लिखना शुरू किया तब से उसे कई बार धमकियां मिलीं। मलाला ने तालिबान के कट्टर फरमानों से जुड़ी दर्दनाक दास्तानों को महज 11 साल की उम्र में अपनी कलम के जरिए लोगों के सामने लाने का काम किया था। मलाला उन पीड़ित लड़कियों में से है जो तालिबान के फरमान के कारण लंबे समय तक स्कूल जाने से वंचित रहीं। तीन साल पहले स्वात घाटी में तालिबान ने लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी थी। लड़कियों को टीवी कार्यक्रम देखने की भी मनाही थी।‍ स्वात घाटी में तालिबानियों का कब्‍जा था और स्‍कूल से लेकर कई चीजों पर पाबंदी थी।

स्कूल जाने से लेकर टीवी देखने तक थी पाबंदी

मलाला भी इसकी शिकार हुई। लेकिन अपनी डायरी के माध्‍यम से मलाला ने क्षेत्र के लोगों को न सिर्फ जागरुक किया बल्कि तालिबान के खिलाफ खड़ा भी किया। तालिबान ने वर्ष 2007 में स्‍वात को अपने कब्‍जे में ले लिया था। और लगातार कब्‍जे में रखा। तालिबानियों ने लड़कियों के स्‍कूल बंद कर दिए थे। कार में म्‍यूजिक से लेकर सड़क पर खेलने तक पर पाबंदी लगा दी गई थी। उस दौर के अपने अनुभवों के आधार पर इस लड़की ने BBC उर्दू सेवा के लिए जनवरी, 2001 में एक डायरी लिखी थी। इसमें उसने जिक्र किया था कि टीवी देखने पर रोक के चलते वह अपना पसंदीदा भारतीय सीरियल ‘राजा की आएगी’ बारात नहीं देख पाती थी।

Malala ने तालिबान से लड़कीयों के लिए लड़ी

वर्ष 2009 में न्‍यूयार्क टाइम्‍स (New York Times) ने मलाला पर एक फिल्‍म भी बनाई थी। स्‍वात में तालिबान का आतंक और महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध विषय पर बनी इस फिल्‍म के दौरान मलाला खुद को रोक नहीं पाई और कैमरे के सामने ही रोने लगी। मलाला डॉक्‍टर बनने का सपना देख रही थी और तालिबानियों ने उसे अपना निशाना बना दिया। उस दौरान दो सौ लड़कियों के स्‍कूल को तालिबान से ढहा दिया था। वर्ष 2009 में तालिबान ने साफ कहा था कि 15 जनवरी के बाद एक भी लड़की स्‍कूल नहीं जाएगी। यदि कोई इस फतवे को मानने से इंकार करता है तो अपनी मौत के लिए वह खुद जिम्‍मेदार होगी।

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जब स्‍वात में तालिबान का आतंक कम हुआ तो मलाला की पहचान दुनिया के सामने आई और उसे बहादुरी के लिए अवार्ड से नवाजा गया। इसी के साथ वह इंटरनेशनल चिल्‍ड्रन पीस अवार्ड (2011) के लिए भी नामित हुई। (2011 में वे नहीं जीत पाईं, लेकिन बाद में 2013 में उन्हें यह अवार्ड भी मिला)।

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